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Saturday, August 27, 2011

ग़ज़ल --हम रीत पुरानी हो जाएँ




बूँद बूँद में घुलकर हम  भी  बहता पानी हो जाएँ..
जिन्दगी को लिखते लिखते एक कहानी हो जाएँ !


अल्फाज़ दिये मैंने अपनी धड़कन कि तहरीरों को..
तुम लबो से छू लो  तो ये   ग़ज़ल सुहानी हो जाएँ !


मेरी आँखों के दर्पण में   खुद को सवाँरा कीजिये.. 
इन  शर्मीली सी आँखों का  हम भी पानी हो जाएँ !


मुझको साँसे बख्श दो   मैं धड़कन तेरी हो जाऊं..
तुम जो ये सौदा करलो जीने कि असानी  हो जाएँ !


तुम राधा कि  दीवानगी  मैं हूँ   मुरली  कि  तान..
अपनाकर  इस प्रीत को  हम रीत पुरानी हो जाएँ  !!


वंदना

Friday, June 17, 2011

ग़ज़ल ,





तेरे बाद   जिन्दगी में  वो मौसम नहीं आये 
खुलकर रोये तो बहुत लेकिन हंस  नहीं पाये 

मेरे पागलन को सौंप कर विरहा  कि अगन 
तुम ऐसे गये की  कभी लौट कर नहीं आये 

रो रो के मना लेते तुझे अपना बना लेते 
रिश्तो कि गरीबी ने  ये हक़ नही  पाये 

देखा है खुदको हमने मिटते रफ्ता रफ्ता 
हम हार गये खुद से हमसे जीत गए साये 

वो रास्ता कि जिससे  हो लौटना  मुश्किल 
भूल कर भी कभी कोई मेरे यार नहीं  जाये

वंदना 






Thursday, June 9, 2011

ग़ज़ल ....





जैसे किस्मत का अपनी सितारा देख लेते हैं 
 टूटकर गिरता हुआ  जब तारा देख लेते हैं 

एक सैलाब आँखों तक आके ठहर जाता है 
बहुत खामोश जब कोई किनारा देख लेते हैं 

दुनिया में किसी से कोई शिकवा नहीं रहता 
हर रिश्ते का बिगड़ता जब नजारा देख लेते हैं

जी तड़प उठता है ताउम्र माँ के सजदे को  
जब कभी कोई बच्चा बेसहारा देख लेते हैं  

जी चाहता है कि खुद से कहीं भाग चलें 
गगन में जब कोई पंछी आवारा देख लेते हैं 

अपना ही ठिकाना कहीं नजर नही आता 
बाकी तेरी आँखों में जंगल सारा देख लेते हैं 

वंदना 




Tuesday, May 3, 2011

गीत -- हम खुद को कान्हा जीत चले ..





भा गयी हमको रीत प्रीत कि,
किया  तेरी भक्ति से प्यार ..
हम खुद को कान्हा जीत चले ,
तुम हारोगे बारम्बार .. .

.................................

सुन रे कन्हाई मोहन प्यारे ..
पहली बार तुम राधा से हारे 
प्रीत जगाकर मन में बसाकर 
तुमने चुन लीना रे संसार .....तुम हारोगे बारम्बार 

..............................

याद करो रे कान्हा  गोकुल कि गैय्या 
वो यमुना के तीर वो ताल तलैय्या 
मधुबन के रास वो वंशीवट कि छैय्या 
जनम जनम का कर्ज रहेगा 
सब गोपियन का प्रेम अपार ............तुम हारोगे बारम्बार 

....................................
कहाए बांवरी एक बंजारन
सुध बुध खोयी तौरे कारन 
दुनिया के  हर जुल्म उठाये 
मीरा ने सदा  तेरे गुण गाये 

जीत लिया मीरा ने तुमको 
उसकी प्रीत लगाई पार  ...........तुम हारोगे बारम्बार 


भा गयी हमको रीत प्रीत कि ..
किया  तेरी भक्ति से प्यार ..
हम खुद को कान्हा जीत चले ..
तुम हारोगे बारम्बार ..



- वन्दना 







Wednesday, December 15, 2010

ग़ज़ल





मुसव्विर* हूँ  मैं ख्वाबो  कि तस्वीर  बनाती हूँ 
इस हुनर ए रायेगाँ* पर   मुझे गुरूर बहुत हैं..

समंदर ,झील ,दरिया ...क्या क्या न कहूँ,
बात इतनी है के उन आँखों में नूर* बहुत है.. 

बक्शी है   खुदा ने   गजब जादूगरी उसको,
इसी आसूदगी* में शायद वो मगरूर बहुत है ..
.
उसकी जुल्फों में उलझकर बहकते हैं झोंके, 
हम तो समझे थे हवाओ में सुरूर* बहुत है.. 

बैठकर यादों के सायें हंसती रही कुछ देर, 
लगा के टूटकर कुछ कहीं चूर चूर* बहुत है.. 

मेरा ही राजकुमार   मुझे   मिलके खो गया,
उसकी खातिर तो    दुनिया में    हूर* बहुत हैं.. 

कू ए जुनूँ* है   इश्क, थक जाऊं   भला कैसे,  
कैसा सबात*   अभी तो अदम*   दूर बहुत है.. 

 है मुमकिन शिकस्त ए दिल* आशना* थे हम,
 हमारे जब्त से खजल* अब ये    नासूर* बहुत है..  

वो परिंदा    मेरी मुंडेर से    बड़ी हैरत* में उड़ा,
कहीं दूर चलूँ   यहाँ   पिंजर ए दस्तूर* बहुत है..

मोला मैं बसर करता रहूँ पंछी बनके हर जनम,
इंसानों कि बस्ती में तो हर कोई मजबूर बहुत है..


"वन्दना "
मुसव्विर*= चित्रकार 
रायेगाँ=  useless work 
noor =  beauty 
आसूदगी  = संपन्नता
सुरूर = नशा 
चूर चूर =  टूटकर बिखरा हुआ   
हूर =  परी 
कू ए जुनूँ*= जूनून कि गली 
सबात =  ठहराव 
अदम =  अंत , शून्य लोक 
शिकस्त ए दिल*  = दिल कि हार 
आशना   =  मालूम होना 
खज़ल=   शर्मिंदा 
नासूर =  जख्म 
हैरत =  हैरानी 

तुम्हे जिस सच का दावा है  वो झूठा सच भी आधा है  तुम ये मान क्यूँ नहीं लेती  जो अनगढ़ी सी तहरीरें हैं  कोरे मन पर महज़ लकीर...