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Thursday, November 28, 2013

ग़ज़ल




लाख चाह कर भी पुकारा  जाता नही है 
वो  नाम अब  लबों पर     आता नही है 

इसे खुदगर्जी कहें या बेबसी का नाम दें 
चाहते हैं पर अना  से हारा जाता नही है 

दिल ख़्वाबों में भटकता एक बंजारा है 
कि जिसके हिस्से में सबात आता नही है  

छुप गया  वो चाँद अब आसमाँ के पीछे 
नूर ए अक्स मगर क्यूँ धुंधलाता नही है 

मुक्कमल दी हैं  हमने सजाएँ  दिल को 
कसूर मगर  इसका समझ आता नही है 

न तुम खफा रहो न किसी को रहने दो 
जो चला जाता है दुबारा आता नही है 

इस बात के एहसास और डर में मरते हैं 
 जिन्दा रहने का हुनर भी आता नही है  !!




~~ वंदना 



Sunday, February 3, 2013

यूं ही दिल के हर कोने में रहेगा




यूं ही दिल के हर कोने में रहेगा 
तेरा होना    मेरे होने   में रहेगा 

रेत एक रोज़ आईना हो  जाएगी 
ये समंदर साहिल धोने में रहेगा 

खुशबुओं के पर निकल आयेंगे
अब सहरा गुलाब बोने में रहेगा 

फिदरत अपनी बदल  दे ऐ इश्क 
कोई  कब तक पाने खोने में रहेगा 

मौन की तहरीरें गढ़ी जा रही हैं 
दिल टूटी कड़ी  पिरोहने में रहेगा 



- वंदना 

Wednesday, November 9, 2011

वक्त तो लगा पर ये गुरूर ...जाता रहा




वक्त तो लगा पर ये  गुरूर ...जाता रहा 
अपनी तहरीरों का सब  नूर ...जाता रहा 

इक इक करके यूं टूटे   वो  सारे भरम 
अफ्कारों का भी  अब सुरूर... जाता रहा 

पाकीज़ा* मोहब्बत खजल* होके रह गयी 
कि वो महताब  ही जब दूर ..जाता रहा 

सजा  नादानियों कि  मिल गयी  हमको 
रफाकतों* का भी सब गुरूर ..जाता रहा

छोड़ गये है   वो गमगुसार* भी   अब तो 
शायद यही सोचकर नासूर* ..जाता रहा !

- वंदना 
खजल = शर्मिंदा 
पाकीज़ा = पवित्र
रफाकत = दोस्ती
गमगुसार = हमदर्द
नासूर = जख्म

Tuesday, September 27, 2011

एक आवारा परिंदे कि उड़ान होता गया




एक आवारा परिंदे कि उड़ान होता गया ,
दिल को हवा लगी आसमान होता गया.. 

कितने मंजर छूट गए उस बेख्याली में,
मैं खुद से भी कैसा अनजान होता गया..

ख़्वाब न हकीकत वो कुछ भी तो न था ,
महज़ इक  भरम का गुमान होता गया.. 

सुधियों को सिखाकर एक गूंगी परिभाषा , 
इक तस्सवुर दिल का महमान होता गया.. 

वरक दर वरक*   दुआएं  बहुत सी पढीं, 
हर इबादत पे दिल ये बेईमान होता गया..

जब्त कि रगों में  इज़्तराब*  ठहर  गया , 
इश्क एक पागल कि मुस्कान होता गया.. 

रफाकत का हमने भी दामन नही छोड़ा , 
खुदगर्ज कोई मुझमे पशेमान* होता गया..

प्यासे समंदर कि सब मछलियां बींद डाली,
जाता हुआ मौसम तीर ए कमान होता गया !!



- वंदना 

वरक दर वरक = पन्ने दर पन्ने 
इज़्तराब = बेचैनी / तड़प 
पशेमान = शर्मिंदा 


Saturday, August 27, 2011

ग़ज़ल --हम रीत पुरानी हो जाएँ




बूँद बूँद में घुलकर हम  भी  बहता पानी हो जाएँ..
जिन्दगी को लिखते लिखते एक कहानी हो जाएँ !


अल्फाज़ दिये मैंने अपनी धड़कन कि तहरीरों को..
तुम लबो से छू लो  तो ये   ग़ज़ल सुहानी हो जाएँ !


मेरी आँखों के दर्पण में   खुद को सवाँरा कीजिये.. 
इन  शर्मीली सी आँखों का  हम भी पानी हो जाएँ !


मुझको साँसे बख्श दो   मैं धड़कन तेरी हो जाऊं..
तुम जो ये सौदा करलो जीने कि असानी  हो जाएँ !


तुम राधा कि  दीवानगी  मैं हूँ   मुरली  कि  तान..
अपनाकर  इस प्रीत को  हम रीत पुरानी हो जाएँ  !!


वंदना

Thursday, July 21, 2011

जिंदगी किस डगर जाये तुझे कहाँ कहाँ ढूंढें







होके बेकरार मेरी साँसे  आहट ओ सदा ढूंढें, 
रुक रुक के धडकनें  तेरे होने के निशाँ ढूंढें ..!


तू छुप गया किसी गुलशन में खुशबू कि तरह,
आरजू ए दिल ए नादाँ * तुझे बनके हवा ढूंढें ..!


इक तलाश इन आँखों को सौपी गयी हो जैसे,
जिंदगी किस डगर जायें ,तुझे कहाँ कहाँ ढूंढें..!




मेरी आँखों में ठहर गया है बनके हया कोई, 
ये नजरें आईने में फिर ना जाने क्या ढूंढें ..!


मेरे हाथों कि बनायीं तू इक तस्वीर ही तो है, 
फिर किस्मत कि लकीरों में  क्यूं  भला ढूंढें..! 


झांककर देखा जो कभी ,खुद में पाया तुझको,
बेचैनियाँ ये पागल मन की   यहां वहां ढूंढें ..  !


तू महज इक तसव्वुर है दिल के ख़ालीपन का, 

कैसे तुझमे  कोई एहसास ए भरम ए वफ़ा ढूंढें ..!



- वंदना 

Friday, June 17, 2011

ग़ज़ल ,





तेरे बाद   जिन्दगी में  वो मौसम नहीं आये 
खुलकर रोये तो बहुत लेकिन हंस  नहीं पाये 

मेरे पागलन को सौंप कर विरहा  कि अगन 
तुम ऐसे गये की  कभी लौट कर नहीं आये 

रो रो के मना लेते तुझे अपना बना लेते 
रिश्तो कि गरीबी ने  ये हक़ नही  पाये 

देखा है खुदको हमने मिटते रफ्ता रफ्ता 
हम हार गये खुद से हमसे जीत गए साये 

वो रास्ता कि जिससे  हो लौटना  मुश्किल 
भूल कर भी कभी कोई मेरे यार नहीं  जाये

वंदना 






Thursday, June 9, 2011

ग़ज़ल ....





जैसे किस्मत का अपनी सितारा देख लेते हैं 
 टूटकर गिरता हुआ  जब तारा देख लेते हैं 

एक सैलाब आँखों तक आके ठहर जाता है 
बहुत खामोश जब कोई किनारा देख लेते हैं 

दुनिया में किसी से कोई शिकवा नहीं रहता 
हर रिश्ते का बिगड़ता जब नजारा देख लेते हैं

जी तड़प उठता है ताउम्र माँ के सजदे को  
जब कभी कोई बच्चा बेसहारा देख लेते हैं  

जी चाहता है कि खुद से कहीं भाग चलें 
गगन में जब कोई पंछी आवारा देख लेते हैं 

अपना ही ठिकाना कहीं नजर नही आता 
बाकी तेरी आँखों में जंगल सारा देख लेते हैं 

वंदना 




Wednesday, December 15, 2010

ग़ज़ल





मुसव्विर* हूँ  मैं ख्वाबो  कि तस्वीर  बनाती हूँ 
इस हुनर ए रायेगाँ* पर   मुझे गुरूर बहुत हैं..

समंदर ,झील ,दरिया ...क्या क्या न कहूँ,
बात इतनी है के उन आँखों में नूर* बहुत है.. 

बक्शी है   खुदा ने   गजब जादूगरी उसको,
इसी आसूदगी* में शायद वो मगरूर बहुत है ..
.
उसकी जुल्फों में उलझकर बहकते हैं झोंके, 
हम तो समझे थे हवाओ में सुरूर* बहुत है.. 

बैठकर यादों के सायें हंसती रही कुछ देर, 
लगा के टूटकर कुछ कहीं चूर चूर* बहुत है.. 

मेरा ही राजकुमार   मुझे   मिलके खो गया,
उसकी खातिर तो    दुनिया में    हूर* बहुत हैं.. 

कू ए जुनूँ* है   इश्क, थक जाऊं   भला कैसे,  
कैसा सबात*   अभी तो अदम*   दूर बहुत है.. 

 है मुमकिन शिकस्त ए दिल* आशना* थे हम,
 हमारे जब्त से खजल* अब ये    नासूर* बहुत है..  

वो परिंदा    मेरी मुंडेर से    बड़ी हैरत* में उड़ा,
कहीं दूर चलूँ   यहाँ   पिंजर ए दस्तूर* बहुत है..

मोला मैं बसर करता रहूँ पंछी बनके हर जनम,
इंसानों कि बस्ती में तो हर कोई मजबूर बहुत है..


"वन्दना "
मुसव्विर*= चित्रकार 
रायेगाँ=  useless work 
noor =  beauty 
आसूदगी  = संपन्नता
सुरूर = नशा 
चूर चूर =  टूटकर बिखरा हुआ   
हूर =  परी 
कू ए जुनूँ*= जूनून कि गली 
सबात =  ठहराव 
अदम =  अंत , शून्य लोक 
शिकस्त ए दिल*  = दिल कि हार 
आशना   =  मालूम होना 
खज़ल=   शर्मिंदा 
नासूर =  जख्म 
हैरत =  हैरानी 

तुम्हे जिस सच का दावा है  वो झूठा सच भी आधा है  तुम ये मान क्यूँ नहीं लेती  जो अनगढ़ी सी तहरीरें हैं  कोरे मन पर महज़ लकीर...