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Monday, August 17, 2009

बारिश की पहली बूँद


बादल की हस्ती को
अपना अस्तित्व बताती हुई
अपना वजूद खोने का
एक डर छुपाती हुई

अपनी एक तरन्नुम से परिंदों को
राग ऐ अंदाज सिखाती हुई
हवाओं की प्यासी अधरों से
अपनी नमी बचाती हुई

बारिश की पहली बूँद जब जमीन पर आती है

हो जाना है उसको दफ़न ...फ़िर भी
न जाने क्यूं इतना इतराती है
अपनी शोहरत के नशे में चूर वो कहती जाती है ..

मैं बारिश की पहली बूँद हूँ
माना के मुझे दफ़न हो जाना है
धरती की प्यासी गोद में मेरा वजूद खो जाना है


मगर हस्ती तो मेरी यूँ ही मिट नही सकती
धरती से वजूद अपना .. वापस चुराकर
मुझे तो भाप बनकर उड़ जाना है

कभी ढलती शाम में पत्तियों पर
अपनी नमी को छिटकाना है
कभी भौंर की इठलाती कलियों पर
शबनम बनकर ठहर जाना है

ये शोहरत भी अति प्यारी है मुझे
मगर मेरा कहाँ कोई एक ठोर ठिकाना है
मैं ही एक रोज बादल बनूंगी
मुझे ही एक रोज फ़िर सावन हो जाना है

कभी फ़िर से बारिश की
पहली बूँद की तरेह दफ़न हो जाना है
या फ़िर आखिरी बूँद की तरेह किसी
दरिया या सागर में ठहर जाना है

मैं जानती हूँ तो बस इतना ..कि

हर
बार मिट मिट कर भी मुझे आबाद हो जाना है
यही मेरी कहानी है यही मेरा सच्चा फ़साना है




तुम्हे जिस सच का दावा है  वो झूठा सच भी आधा है  तुम ये मान क्यूँ नहीं लेती  जो अनगढ़ी सी तहरीरें हैं  कोरे मन पर महज़ लकीर...