मत कैद करो उड़ने दो मुझको
मैं पंछियों की तरह उड़ना चाहता हूँ ...
मत इर्ष्या के बीज बोवो , मत दो नफरत का खाद पानी ,
मैं मोहब्बत का कमल बनकर उगना चाहता हूँ ...
मेरी आरजुओं को मत कुचलो अपने स्वार्थ तले,
मैं आजाद पंछी बनकर जीना चाहता हूँ ...
एक एक करके तमन्नाये मेरी दम तोड़ रही है खोकले दस्तूरों की कैद में
मैं अपने ही वाजूद से भाग जाना चाहता हूँ ...
गिरा हूँ ,चोट खाया हूँ ,मगर देखकर वक्त की रफ़्तार
मैं एक बार फिर संभल जाना चाहता हूँ ...
न हंस सके कोई मेरे हाल ऐ बेबसी पर
मैं आज फिर यूँ ही (जूठ मूठ) मुस्कुराना चाहता हूँ
गीत, ग़ज़ल, नज्म ..ये सब मेरी साँसों कि डोर, महंगा पड़ेगा बज्म को मेरी खामोशियों का शोर ! --- "वन्दना"
Sunday, May 17, 2009
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hum azad hone ke baad bhi prakrati ke niyamon ki qaid mein hain.
ReplyDeletekavita sunder hai.
bahut sunder....... pyari lagi ye post
ReplyDeleteदिल की गुहार पढ़ी , पसंद आई.
ReplyDeleteमत कैद करो उड़ने दो मुझको
मैं पंछियों की तरह उड़ना चाहता हूँ ...
- विजय
मेरी आरजुओं को मत कुचलो अपने स्वार्थ तले,
ReplyDeleteमैं आजाद पंछी बनकर जीना चाहता हूँ ...
एक एक करके तमन्नाये मेरी दम तोड़ रही है खोकले दस्तूरों की कैद में
मैं अपने ही वाजूद से भाग जाना चाहता हूँ ...
Dil se nikle hue bhaav bahut hi sundarta se piroye hain. Bahut hi marmsparshiya rachana.