गीत, ग़ज़ल, नज्म ..ये सब मेरी साँसों कि डोर, महंगा पड़ेगा बज्म को मेरी खामोशियों का शोर ! --- "वन्दना"
इस तरह भी ये जिन्दगी .अक्सर मिली हमसे मुर्ख बताकर द्रोपदी जैसे दुर्योधन पर हँसती है ...वाह
सुन्दर अभिव्यक्ति...
बहुत खूब वंदना जी
बहूत जादा रोशनी भी आंखो को चुभती है...बहूत हि बेहतरीन बात कही है..लाजवाब:-)
सुंदर अभिव्यक्ति..
वाह ...बहुत खूब।
oho...kya analogy hai...2nd one is too good :)
तुम्हे जिस सच का दावा है वो झूठा सच भी आधा है तुम ये मान क्यूँ नहीं लेती जो अनगढ़ी सी तहरीरें हैं कोरे मन पर महज़ लकीर...
इस तरह भी ये जिन्दगी .अक्सर मिली हमसे
ReplyDeleteमुर्ख बताकर द्रोपदी जैसे दुर्योधन पर हँसती है
...वाह
सुन्दर अभिव्यक्ति...
ReplyDeleteबहुत खूब वंदना जी
ReplyDeleteबहूत जादा रोशनी भी आंखो को चुभती है...
ReplyDeleteबहूत हि बेहतरीन बात कही है..
लाजवाब:-)
सुंदर अभिव्यक्ति..
ReplyDeleteवाह ...बहुत खूब।
ReplyDeleteoho...kya analogy hai...2nd one is too good :)
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