गीत, ग़ज़ल, नज्म ..ये सब मेरी साँसों कि डोर, महंगा पड़ेगा बज्म को मेरी खामोशियों का शोर ! --- "वन्दना"
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तुम्हे जिस सच का दावा है वो झूठा सच भी आधा है तुम ये मान क्यूँ नहीं लेती जो अनगढ़ी सी तहरीरें हैं कोरे मन पर महज़ लकीर...
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खुद को छोड़ आए कहाँ, कहाँ तलाश करते हैं, रह रह के हम अपना ही पता याद करते हैं| खामोश सदाओं में घिरी है परछाई अपनी भीड़ में फैली...
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मुट्ठी से यूं हर लम्हा छूटता है साख से जैसे कोई पत्ता टूटता है हवाओं के हक़ में ही गवाही देगा ये शज़र जो ज़रा ज़रा टूटता है ...
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एक सांस भटकती होगी कुछ कुछ अटकती होगी एक लम्बी सी ख़ामोशी सीने में खटकती होगी जहन कि सीढ़ी पर जब पाँव पटकती होगी उल्फत कि डो...

शुभकामनायें ||
ReplyDeleteयह रंगों का ही खेल है ॥ सुंदर अभिव्यक्ति
ReplyDeleterango ka khel...sundar bhaav...
ReplyDeleteगहरी अभिव्यक्ति गहरी सोच
ReplyDeleteक्या खूभ चितेरा है ऊपर वाला और क्या खूब रंग भरे हैं उसमें जिंदगी ने!
ReplyDeleteआपकी भी कामना कुछ वैसी सी! सुंदर अभिवयक्ति!
इन रंगों से ही तो नए रंग भी बनते हैं नए ख़्वाबों की तरह ...
ReplyDeleteबहुत खूब लिखा है ...
सही कहा आपने
ReplyDeleteवाह ...बहुत खूब।
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