गीत, ग़ज़ल, नज्म ..ये सब मेरी साँसों कि डोर, महंगा पड़ेगा बज्म को मेरी खामोशियों का शोर ! --- "वन्दना"
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तुम्हे जिस सच का दावा है वो झूठा सच भी आधा है तुम ये मान क्यूँ नहीं लेती जो अनगढ़ी सी तहरीरें हैं कोरे मन पर महज़ लकीर...
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खुद को छोड़ आए कहाँ, कहाँ तलाश करते हैं, रह रह के हम अपना ही पता याद करते हैं| खामोश सदाओं में घिरी है परछाई अपनी भीड़ में फैली...
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वफायें ..जफ़ाएं तय होती है इश्क में सजाएं तय होती हैं पाना खोना हैं जीवन के पहलू खुदा की रजाएं.. तय होती हैं ये माना... के गुन...
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मुट्ठी से यूं हर लम्हा छूटता है साख से जैसे कोई पत्ता टूटता है हवाओं के हक़ में ही गवाही देगा ये शज़र जो ज़रा ज़रा टूटता है ...

वाह!
ReplyDeleteपुरवा अदब सीख ले तो पुरवा नहीं रह जाएगी ...
ReplyDeleteBeautiful!! :)
ReplyDeleteबहुत सुन्दर ... जवाब रश्मि जी ने दे दिया है :)
ReplyDeleteबेहद खुबसूरत
ReplyDeleteवाह क्या खूब कहा है।
ReplyDeleteवाह!
ReplyDeleteबहुत सुन्दर त्रिनेणी!
बेजोड़ भावाभियक्ति....
ReplyDeleteबेहतरीन पंक्तियां सुन्दर भाव..
ReplyDeleteवाह ... त्रिवेणी का जादू चल गया ...
ReplyDeletewow....what a thought!!
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