गीत, ग़ज़ल, नज्म ..ये सब मेरी साँसों कि डोर, महंगा पड़ेगा बज्म को मेरी खामोशियों का शोर ! --- "वन्दना"
Thursday, August 25, 2011
Wednesday, August 24, 2011
Monday, August 22, 2011
Thursday, August 18, 2011
तसव्वुर के मौसम
बचपन कि वो बरसाते
जब स्कूल से आते वक्त
अक्सर भीगने का लुफ्त
लेने में मेरी किताबे भी
भीग जाया करती थी
और फिर मैं धूप का
इन्तजार करती थी
उन्हें सुखाने के लिए
आज समझ आया
चाहत और जरूरत में
कितना फर्क है
बरसातें मेरी चाहत है
और धूप जरुरत !
दुसरे शब्दों में कहूँ
तो तुम वही एक बरसात हो
जिसने भिगो दिया है
मेरे वजूद को ...
और मुझे जिंदगी से
धूप कि तलाश है ..
अजीब बात है
धूप सुखा सकती है
हमारे सीलेपन को
मगर भीगने के
उस सुखद एहसास को नहीं ..
जो हर बरसते मौसम में
हरा हो जाया करता है ...
" जिंदगी कि ये धूप
और तसव्वुर के मौसम
कौन किस्से हारे
कौन किसको जीते !
- वंदना
Tuesday, August 16, 2011
Monday, August 15, 2011
Sunday, August 14, 2011
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सोचती हूँ इस फ़साने का अब कोई अदम लिख दूं क़त्ल ए किरदार से पहले एक आखरी नज्म लिख दूं .... जिंदगी नयी शर्तों पर फिर जीने के मोहलत ले आय...






