गीत, ग़ज़ल, नज्म ..ये सब मेरी साँसों कि डोर, महंगा पड़ेगा बज्म को मेरी खामोशियों का शोर ! --- "वन्दना"
Wednesday, August 24, 2011
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तुम्हे जिस सच का दावा है वो झूठा सच भी आधा है तुम ये मान क्यूँ नहीं लेती जो अनगढ़ी सी तहरीरें हैं कोरे मन पर महज़ लकीर...
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खुद को छोड़ आए कहाँ, कहाँ तलाश करते हैं, रह रह के हम अपना ही पता याद करते हैं| खामोश सदाओं में घिरी है परछाई अपनी भीड़ में फैली...
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एक सांस भटकती होगी कुछ कुछ अटकती होगी एक लम्बी सी ख़ामोशी सीने में खटकती होगी जहन कि सीढ़ी पर जब पाँव पटकती होगी उल्फत कि डो...
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सोचती हूँ इस फ़साने का अब कोई अदम लिख दूं क़त्ल ए किरदार से पहले एक आखरी नज्म लिख दूं .... जिंदगी नयी शर्तों पर फिर जीने के मोहलत ले आय...

वाह: बहुत सुन्दर..कम शब्दों में अधिक भाव...
ReplyDeleteयह विधा तो बहुत बढ़िया रही!
ReplyDeleteअच्छा शेर लिखा है आपने!
हाँ, दूसरे से पहले अपने पर ऐतबार जरूरी है..
ReplyDeleteसुंदर
तू अपने ऐतबार पर ऐतबार तो रख... वाह सुन्दर....
ReplyDeleteसादर बधाई...
सच है अपने एइत्बार पर ही ऐतबार नहीं होता ..
ReplyDeleteलाजवाब ...
जितने कम शब्द उतनी ही गहराई है...
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