गीत, ग़ज़ल, नज्म ..ये सब मेरी साँसों कि डोर, महंगा पड़ेगा बज्म को मेरी खामोशियों का शोर ! --- "वन्दना"
Monday, August 15, 2011
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तुम्हे जिस सच का दावा है वो झूठा सच भी आधा है तुम ये मान क्यूँ नहीं लेती जो अनगढ़ी सी तहरीरें हैं कोरे मन पर महज़ लकीर...
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खुद को छोड़ आए कहाँ, कहाँ तलाश करते हैं, रह रह के हम अपना ही पता याद करते हैं| खामोश सदाओं में घिरी है परछाई अपनी भीड़ में फैली...
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वफायें ..जफ़ाएं तय होती है इश्क में सजाएं तय होती हैं पाना खोना हैं जीवन के पहलू खुदा की रजाएं.. तय होती हैं ये माना... के गुन...
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मुट्ठी से यूं हर लम्हा छूटता है साख से जैसे कोई पत्ता टूटता है हवाओं के हक़ में ही गवाही देगा ये शज़र जो ज़रा ज़रा टूटता है ...

चंद पंक्तिया बहुत कुछ कह गयी....
ReplyDeleteबहुत सुन्दर और सार्थक!
ReplyDeleteआजादी की 65वीं वर्षगाँठ पर बहुत-बहुत शुभकामनाएँ!
बहुत सुन्दर ....्स्वतंत्रता दिवस की शुभ कामनाएँ....
ReplyDeleteगुज़रे हुए लम्हों को पकड़ने की तमाम हसरत है
ReplyDeleteख़्वाब को पलकों में जकड़ने की नाकाम कसरत है.
ज़िंदगी तिजारत है, इश्क भी...और नफ़रत भी.
...एक खूबसूरत यकीन भी ....और ग़फ़लत भी.
चलो, आंसुओं को बटोर लायें सारी बस्तियों से
इसके खार से कितना परेशान है समंदर भी !
काफी दिनों बाद त्रिवेनियाँ पढने को मिल रही है...
ReplyDeleteआपका आभार... सुन्दर भाव हैं...
राष्ट्र पर्व की हार्दिक बधाइयां...
कोमल भावों से सजी ..
ReplyDelete..........दिल को छू लेने वाली प्रस्तुती