गीत, ग़ज़ल, नज्म ..ये सब मेरी साँसों कि डोर, महंगा पड़ेगा बज्म को मेरी खामोशियों का शोर ! --- "वन्दना"
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तुम्हे जिस सच का दावा है वो झूठा सच भी आधा है तुम ये मान क्यूँ नहीं लेती जो अनगढ़ी सी तहरीरें हैं कोरे मन पर महज़ लकीर...
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कुछ रिश्ते बेनाम होते हैं कुछ रिश्तों के नाम होते हैं बेनाम रिश्ते में कोई शर्त नहीं होती सिर्फ प्रेम होता है वो क्यूं हैं .क्या ...
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वफायें ..जफ़ाएं तय होती है इश्क में सजाएं तय होती हैं पाना खोना हैं जीवन के पहलू खुदा की रजाएं.. तय होती हैं ये माना... के गुन...
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सोचती हूँ इस फ़साने का अब कोई अदम लिख दूं क़त्ल ए किरदार से पहले एक आखरी नज्म लिख दूं .... जिंदगी नयी शर्तों पर फिर जीने के मोहलत ले आय...

बहुत सुन्दर प्रस्तुति।
ReplyDelete--
आपकी इस प्रविष्टि् की चर्चा कल सोमवार (13-10-2014) को "स्वप्निल गणित" (चर्चा मंच:1765) (चर्चा मंच:1758) पर भी होगी।
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चर्चा मंच के सभी पाठकों को
हार्दिक शुभकामनाओं के साथ।
सादर...!
डॉ.रूपचन्द्र शास्त्री 'मयंक'
बहुत सुन्दर एहसास
ReplyDeleteआभार
मुझको बख्श तू धूप घनेरी
ReplyDeleteपर मेरे ही साये ना छीन
बहुत सुन्दर भावों से रचाई है ये रचना....बधाई
वाह ... छोटे छोटे लाजवाब सादगी भरे शेर ...
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