वो बनकर बहारे तेरा ..
डाली डाली पर बिखर जाना,
वो सावन में बरसना ऐसे ....
महफिल मैं जैसे किसी पैमाने का छलक जाना ,
वो पंछियों में छुपकर हर रोज तेरा चैह्चाना ......
जैसे कान्हा की बंसी छेड़े
राधा की प्रीत का तराना,
वो बनकर तितली मेरी बगिया मैं तेरा इतराना .....
जैसे मदमस्त हवा में आँचल का लहराना ,
वो बनकर शबनम की बूंदे ..कलियों को तेरा भिगो देना ...
जैसे मजदूर के माथे से पसीने का टपक जाना ,
"वो बनकर ममता का स्वरूप उन आँखों में स्नेह सागर का उमड़ आना
मानो माँ की भोली सूरत में ही बसता है तेरी खुदाई का खजाना "
**ऐ प्रकृति के मालिक हाँ मैंने ये माना...
तू ही एक सच्ची गजल है ,बाकि सब जूठा है फ़साना
गीत, ग़ज़ल, नज्म ..ये सब मेरी साँसों कि डोर, महंगा पड़ेगा बज्म को मेरी खामोशियों का शोर ! --- "वन्दना"
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gazab vandana! jadoo hain pura.. bahut khoob . keep writing
ReplyDeletebahut khoob vandana ji, bahut sahi gazal hai aapki. badhai
ReplyDeleteअच्चे भाव समेटे है आपकी कविता
ReplyDeleteपढ़ कर अच्छा लगा
आपका वीनस केसरी
तू ही एक सच्ची गजल है ,बाकि सब जूठा है फ़साना ......kya baat hai........rabba mere rabba .....maula mere maula.....!!
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