Monday, February 22, 2016




बहुत कुछ था मेरे पास 
जो मैं कह देना चाहती थी 

मगर मौन यूं  गहरा गया  जिंदगी में 
कि बहुत सोचती हूँ कुछ बोलने से पहले 

अब सोचती हूँ तो लगता है 
एक पूरी कहानी थी 
 जो सुनानी थी तुमको 
मगर वो भी खर्च हो गयी 
सिर्फ सोचने मैं 

आज मैं फिर सोच रही हूँ 
एक आखिरी बार "मुबारक"
कहना है तुम्हे !!








Wednesday, December 16, 2015

ग़ज़ल



ना ठोकर ही नयी है, ना जख्म पुराने हैं 
हर  हाल में  जिंदगी तेरे  नाज़ उठाने हैं

सिमटने तो लगें हैं पँख हमारी अना के  
आसमां से अपने भी मगर बैर पुराने हैं 

लिखी गयी हैं जिन पर तहरीर ऐ वजूद 
किताब ए जिंदगी के वो सफ़हे बचाने हैं 

ढाला जा रहा है किसी मूक बुत में मुझे 
मगर मुझको मेरे सब किरदार चुराने हैं 

लिखना है किस्सा आँखों की नमी का 
गोया  कि इस दिल के दर्द भी छुपाने हैं 

~ वंदना 

Saturday, November 28, 2015

आम लड़की

ना मैं रुक्मणि थी 
ना मैं पार्वती 
ना मैं भरोसा चुन सकती थी 
ना ही तपस्या 

राधा हो जाने की 
सारी इच्छाओं को मारकर 
जैसे चुनती है कोई लड़की 
सीता हो जाना 
ठीक उसी तरह 
मैंने भी चुनना चाहा 

मगर मेरा अहम् 
न स्वीकार सका परीक्षाएं 
और उनसे हार जाना तो
बिलकुल भी नही !

मैंने आसान समझा था 
हर रस्म हर रिवाजों से 
बगावत कर
मीरा हो जाना 

मगर मेरे पास नही था 
वो यकीन जो 
जहर के प्यालों को 
अमरित करता 

हर विकल्प को हारकर 
मैं बची हूँ वही आम लड़की 
जिसके हिस्से में दोराहे नही होते 
वह समझोतों की बिसात पर 
अंततः खुद को सिर्फ एक औरत 
साबित कर पाने तक ही समर्पित है 

~ वंदना 




Monday, November 23, 2015

त्रिवेनियाँ




हाँ मैंने  तुम्हे पीछे से आवाज़ दी थी 
ये जानते हुए भी की तुम नही रुकोगे 

मुझे सिर्फ तुम्हारा लौटना आसान करना था !

***

अगर  जिंदगी  फिर  कभी ऐसे दोराहे पर लाये 
जहाँ तुम्हे कोई लाख चाहकर न पुकार पाये 

तो समझना तुम अपने ही सन्नाटें में खो चुके हो !


***

जब रात चांदनी की आगोश में दम तोड़ चुकी होगी 
जब चाँद को गहराते हुए सन्नाटें फाँक चुके होगे 

तुम अपनी खिड़की पर मुझे जागता पाओगे !

***

जब हर टूटन तुम्हारे बदन से रिस चुकी हो
जब पीर का पखेरू कफ़स तोड़  कर जा चुका हो

खुद को एक बार फिर जिन्दा घोषित कर देना !

***


 दिलों के कच्चे यकीन  की छत टपक रही थी 
पलकों के शामियाने में इंतज़ार भीग रहा था 

इश्क का वजूद गल कर गारा हो गया 

***


लड़की के पास चंद सीपियाँ थी  साहिल के रेत से चुनी हुईं
लड़के को उनमे एक भी मोती नही मिला तो लौट गया 

लड़की ने अपनी चाहना सीपियों के साथ रेत  में दफना दी! 




~ वंदना 





Friday, July 3, 2015

आसमां और जमीं



नीचे जमीं है
ऊपर आसमां
लगता है जैसे
मैं इन दोनों के
बीच कहीं नही हूँ

मैं हूँ तो कहाँ हूँ
किस जगह की हूँ
किसके लिए हूँ
अगर कुछ है
इस छण, तो
सिर्फ एक डर  है
खुद को खो देने का डर
इस आसमां में जहाँ
मेरे मौन के सन्नाटों सी
एक वीरानी है
या उस जमीं में जहाँ
मेरे ज़हन की बेचैनियों के
शोर सा कोलाहल है

मैं ठहरना चाहती हूँ
इन दोनों के बीच कहीं
कोई केंद्र तो होगा
मेरे दिल के किसी
कोने सा खाली

मैं ठहर जाना चाहती हूँ
एक ऐसी जगह पर जहाँ
हवाएं भी मुझसे ला-ताल्लुक सी हो !
जहाँ मुझसे मेरे होने की
गवाही न तलब की जाए !
जहाँ मेरी नींदों को
सपनो से न तोला जाएँ!
जहाँ हसरते न लाचार हों
जहाँ जिंदगी कोई
 तिजारत न जानती हो
जहाँ सब कुछ ऐसा ही हो
जैसा दिखाई पड़े
जहाँ कोई सपना
आखों में तैरता न हो
जहाँ कोई भी आहत
दिल को बेचैन न करती हो
जहाँ कोई उम्मीद आखों में
पानी बनकर न ठहरे
जहाँ सोच के धागे
कुछ भी न बुनना जानते हों
बस मैं ठहरजाना चाहती हूँ
अपने हिस्से की जमीं में
अपने आसमान के नीचे ! 

~ वंदना 

Monday, March 2, 2015

खारा पानी


( the picture taken from Google with due respect ) 

झर झर झरता खारा पानी 
झील उतरता खारा पानी 
नयनन भरता खारा पानी 
पनघट मरता खारा पानी 

हद दरिया की खारा पानी 
ज़द दरिया की खारा पानी 
लहरों की तड़प खारा पानी 
साहिल की तलब खारा पानी 

पत्थर की प्यास खारा पानी 
मछली की सांस खारा पानी 
कांटें की फांस खारा पानी 
जीने की आस खारा पानी 

बादल की प्रीत खारा पानी 
सावन का मीत खारा पानी 
जोगन का गीत खारा पानी 
अश्कों की रीत खारा पानी 

बे मुकाम सफ़र खारा पानी 
लम्बी सी  डगर खारा पानी 
छोटी सी उमर खारा पानी 
हासिल ए सिफ़र* खारा पानी 

~ वंदना 

( सिफ़र = अंत )


तुम्हे जिस सच का दावा है  वो झूठा सच भी आधा है  तुम ये मान क्यूँ नहीं लेती  जो अनगढ़ी सी तहरीरें हैं  कोरे मन पर महज़ लकीर...