गीत, ग़ज़ल, नज्म ..ये सब मेरी साँसों कि डोर, महंगा पड़ेगा बज्म को मेरी खामोशियों का शोर ! --- "वन्दना"
Saturday, October 11, 2014
Thursday, October 2, 2014
Tuesday, August 5, 2014
नज़्म
तुमको ख़ामोशी के उसपार से
हर आजमाइश से आगे बढ़कर
हर खलिश को रोंधते हुए
खुद से किये हुए हर एक
समझोते को खत्म कर
बस एक बेपरवाही में ।
खुद में सिमटना संजीदगी है
या फिर एक जकड़न का नाम.
बंधता जाता है इंसान
अपनी ही बुनी हुई गिरहों से ।
समझ नही पा रही हूँ मैं
खुदगर्जी और बेबसी के बीच का
ये फर्क जो मेरे ज़हन में
एक लकीर की तरह
मुक्कमल हो रहा है।
मुक्कमल हो रहा है।
बंट गयी हूँ मैं
अपने ही भीतर कई हिस्सों में।
मुझे इसका अफ़सोस भी है
और इल्म भी, कि
" मजबूत होता है
मोहब्बत की आकर्ति
और आकर्षण में
" मजबूत होता है
मोहब्बत की आकर्ति
और आकर्षण में
बंधा हुआ इंसान
और इस बंधन से टूटकर गिरा हुआ
उतना ही खोकला और बेबस "
~ वंदना
Wednesday, June 18, 2014
Wednesday, June 11, 2014
उलझन
अपने अंतर्मन के
इसी सन्नाटे से
डरती रही मैं आजकल
अच्छा लग रहा है
मगर अब
अपने भीतर का ये शून्य
मैं ठहर पा रही हूँ
जिंदगी के मंच के
खुरदुरे धरातल पर
अपनी एड़ियों की पकड़
मजबूत लगने लगी है
खुद को समझाना इतना
मुश्किल नही था शायद
बस वक्त लग गया
ख़्वाब और हकीकत का
फर्क समझने में
सुलझ गयीं हैं
मन की फांस
सुलझ गयीं हैं
मन की फांस
मगर फिर भी है
कुछ अनसुलझा सा
इस दरमियाँ
जिसे सुलझा मैं पाती नही
और उलझना मैं चाहती नही !
~ वंदना
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