Saturday, October 11, 2014

मुझसे मेरी प्यास ना छीन



मुझसे मेरी प्यास ना छीन 
जीने का एहसास ना छीन

न हो शामिल सफर में लेकिन
 पंख न छीन परवाज़ ना  छीन

ये उजले अँधेरे हैं जीवन के
तारों की तू सौगात ना  छीन

झूठे - सच्चे ख़ाब दिखा पर 
मुझसे मेरी नींद ना छीन 

मुझको बख्श तू धूप घनेरी
पर मेरे ही  साये ना छीन

~ वंदना 

Thursday, October 2, 2014

नज़्म




वक्त का पिंजर 
परिंदे  को अक्सर 

छोड़ देता है कुछ पल 
 भटकने के लिए 


मगर परवाज़ इस कदर 
बोझिल है की 
सिमटके रह जाती है 
माज़ी के दरीचों में  

अक्सर अपने ही 
सायो  से टकराकर 
जब गिर पड़ता है 
तो समेटता हुआ अपने आप को 
 यूं कह कर  उठ जाता है

प्यार ,दिल में जिन्दा रहता है 
बस आँखों में मर जाता है !


~ वंदना 



Tuesday, August 5, 2014

नज़्म



जी चाहता है पुकार लूँ 
 तुमको ख़ामोशी के उसपार से
हर आजमाइश से आगे बढ़कर 
हर खलिश को रोंधते हुए
खुद से किये हुए हर एक 
समझोते  को खत्म कर 
बस एक बेपरवाही में ।

खुद में सिमटना  संजीदगी है
 या फिर एक जकड़न का नाम. 
बंधता जाता है इंसान 
अपनी ही बुनी हुई गिरहों से । 

समझ नही पा रही हूँ मैं 
खुदगर्जी और बेबसी के बीच का
 ये फर्क जो मेरे ज़हन में 
एक लकीर की तरह 
मुक्कमल हो रहा है। 

बंट गयी हूँ मैं
 अपने ही भीतर कई हिस्सों में।  
मुझे इसका अफ़सोस भी है 
और इल्म भी,  कि  

" मजबूत होता है 
मोहब्बत की आकर्ति 
और आकर्षण में 
बंधा हुआ इंसान
  और इस बंधन से टूटकर गिरा हुआ 
उतना ही खोकला और बेबस "

~ वंदना 






Wednesday, June 18, 2014

त्रिवेणी



मुमकिन है पानी पर पैरों को जमाना 

तपती रेत का एक रोज़ आईना हो जाना 

बस तुम खुद से बहुत दूर न निकल जाना !

वंदना 


Wednesday, June 11, 2014

उलझन



अपने  अंतर्मन के 
इसी सन्नाटे से  
डरती रही मैं आजकल 

 अच्छा लग रहा है 
 मगर अब 
अपने  भीतर का ये शून्य 

मैं ठहर पा रही हूँ 
 जिंदगी के मंच के 
खुरदुरे धरातल पर 


अपनी एड़ियों की पकड़ 
मजबूत लगने लगी है 


खुद को  समझाना इतना 
मुश्किल नही था शायद 

बस वक्त लग गया 
ख़्वाब और हकीकत का 
फर्क समझने में

सुलझ गयीं हैं
मन की फांस 

मगर फिर भी है
कुछ अनसुलझा सा
इस दरमियाँ

जिसे सुलझा मैं पाती नही
और उलझना मैं चाहती नही !

~ वंदना






Thursday, May 29, 2014




दिल रोया है 
उन अजीब लम्हों को याद करके ....

जब दिल के दरवाजे पर 
तेरी दस्तक से

सोयी ख्वाहिशे 
इस तरह 
तिलमिला कर जागी थी ....

मानों किसी ने 
ठहरे पानी में 
पत्थर फेंका था ,,

कोई दुआ करे
 के उन्हें फिर नींद आ जाये


शायद अब खुदा तक 
मेरी अर्जी नहीं जाती ...

Friday, May 2, 2014





न तुम इतने नादाँ थे 
न मैं इतनी समझदार 
की भर पाते 
हम
दिलों में खिंचती 
 उन लकीरों को 
कि जिन पर 
अहम की 
दीवार को 
बुनियाद मिल गई !


तुम्हे जिस सच का दावा है  वो झूठा सच भी आधा है  तुम ये मान क्यूँ नहीं लेती  जो अनगढ़ी सी तहरीरें हैं  कोरे मन पर महज़ लकीर...