गीत, ग़ज़ल, नज्म ..ये सब मेरी साँसों कि डोर, महंगा पड़ेगा बज्म को मेरी खामोशियों का शोर ! --- "वन्दना"
Sunday, January 15, 2012
Thursday, January 12, 2012
शायर मन ..
एक आवारा सी ऊब दिन भर कि भागदौड से
लम्हे चुराकर एकांत में
कुछ पल ..खुद में
सिमटकर बैठ गयी ..
और आलसी सा शायर मन
नींद से बोझिल आँखे लिए
खिड़की पर सिर टिकाये
चाँद के वरक पलट रहा हैं !
देख रहा है अपने साथ
जागती.... इस रात को ..
साँसों में उतरती शीतल चांदनी को
जुगनुओं कि जलती बुझती तकदीर को
पत्तो पर फैलती शबनम को ..
.
मगर ढूंढ रहा है उन शब्दों को
जिनमे लपेट सके ये बिखरे हुए
तमाम सितारे ...तलाश रहा है
अपने भीतर एक सन्दर्भ को
ताकि कुछ निर्जीव से
एहसासों को अर्थ मिल सकें !
मगर दिल के अलाप
उसके किसी सुर से
समझोता नही चाहते
वह उसी तरन्नुम में बहना चाहते हैं
जो टीस बनकर दबी पड़ी है
सीने कि जाने कौन सी परतो में ..
जिसे बाँधा हुआ उसने अपने
अहम् और स्वाभिमान कि बेड़ियों से
जो अगर गलती से भी खुल जाए
तो ये पुरवाई पतझड़ को
बहारों से भर दे !
थके परिंदों कि उड़ानों को
नये आकाश मिल जाएँ ..
बादल बे मौसम इस तरह बरसें
कि प्यास सावन से हार जाये !.
गीत ..नज्म ..गजल ...
एक इबादत कि तरह
सुकून का मेह बनकर
बरस पड़ें .इस बंजर
मन के आँगन में ..
मगर ये पागल मन
ये समझदारी कभी नही करता
सिर्फ तलाश रहा है
अर्थहीन बातो के सन्दर्भ
ताकि कोई तुकबंद रचना
अहम् को संतुस्ट कर सके..!
"मुझे लिखकर सुकूँ आया
तुम्हे पढ़कर सुकूँ आया
उसे हार में भी जीत मिली
जिसे शब्दों को जादू आया "
तुम्हे पढ़कर सुकूँ आया
उसे हार में भी जीत मिली
जिसे शब्दों को जादू आया "
- वंदना
Saturday, January 7, 2012
Tuesday, January 3, 2012
Saturday, December 31, 2011
ले गया है बहुत कुछ ये साल जाते जाते ..
इस दौर को कर गया निढाल जाते जाते
ले गया है बहुत कुछ ये साल जाते जाते ..
शक्लें दीं थी जिन्होंने इस नए ज़माने को
तोड़ गया वो आईने ,ये काल जाते जाते..
तरन्नुम का हमसे जिसने तार्रुफ़ कराया था
उदास छोड़ गया ग़ज़लें ,वो बेमिशाल जाते जाते.
सच जिंदगी उम्र कि हर बंदिश से आगे है
ख़त्म हुई कैसे ये कदमताल जाते जाते..
ले गया है बहुत कुछ ये साल जाते जाते ..
शक्लें दीं थी जिन्होंने इस नए ज़माने को
तोड़ गया वो आईने ,ये काल जाते जाते..
तरन्नुम का हमसे जिसने तार्रुफ़ कराया था
उदास छोड़ गया ग़ज़लें ,वो बेमिशाल जाते जाते.
सच जिंदगी उम्र कि हर बंदिश से आगे है
ख़त्म हुई कैसे ये कदमताल जाते जाते..
दिखाए थे नए आकाश मेरी उड़ानों को
वक्त फेंक गया कैसा ये जाल जाते जाते..
- वंदना
वक्त फेंक गया कैसा ये जाल जाते जाते..
- वंदना
Friday, December 9, 2011
Saturday, December 3, 2011
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