Friday, October 21, 2011

छणिका..





एक तरफ़ा प्यार 
क्या है ?
मूर्खता 
पागलपन
 श्रद्धा
विश्वास 
पूजा 
 समर्पण 
कमजोरी 
गुनाह  
बेबसी 
घुटन 
दुआ  
आस्था 
या भरम 
?????

सबकुछ 
होकर भी 
कुछ नहीं !!


Wednesday, October 19, 2011

ग़ज़ल







फिरता है मन तारा तारा..

खोज लिया अम्बर ये सारा !


इस बंजारे ने कर दीनी ..

जोगन रातें दिन आवारा !



बारिश का पानी है या है

आंसू कोई खारा खारा ...!



सूनी सूनी सी आँखों से ..

बहता जाये काज़ल सारा !



आँखों का ये धोखा है सब..



जुगनू को समझो ना तारा !!



वंदना 

Monday, October 17, 2011

त्रिवेणी





चाँद भीगी बिल्ली सा ,बादल सारे तितर बितर 
अंधकार  में डूबे गगन में  मची हो भगदड़ जैसे 

मौसम का मिजाज़ नही , ये हवा का रुतबा है !!


वंदना 

Sunday, October 16, 2011

त्रिवेणी



किसी के   दर्द में शामिल ...बस दुआ तुम्हारी हो 
किसी की मुस्कुराहटो में मुस्कुराती खुशी तुम्हारी हो, 

न जमीं पे न आसमान में ,रिश्ते बनते हैं दिल के जहान में !!



वंदना 

Saturday, October 15, 2011

मुझ पर मेरा रंग



सपने , उम्मीद , आरजू ,
 दुआ , जिंदगी और 
तमाम सारे रंग समेटे
एक चाँद उगा है 
मेरी हथेली पर ....

अर्घ कि हैं जिसे मैंने 
अपनी हर ख्वाइश 


इसकी  गहराई लालिमा  में 
मुस्कुराती है मेरी श्रद्धा 
मेरा विश्वास, 

दुआ करती हूँ 
मेरा अपना ये रंग 
कभी फीका न हो ..

- वंदना 

Wednesday, October 12, 2011

कड़वा है मगर सच दुनिया का बताया है मुझे !


जिंदगी का  अहम् सबक  सिखाया है मुझे 
ख़्वाब ओ हकीकत में फर्क दिखाया है मुझे 

कल रोते हुए तुमने ही लगाया था गले 
भरी महफ़िल में आज गैर जताया है मुझे

अपनी सफाई में मेरे पास कुछ है ही नहीं 
मेरी ही नजर  में गुनहगार बनाया है मुझे 

दोस्ती के जैसे  अब मतलब ही खो गये 
रिश्तों का ये कैसा सच पढ़ाया है मुझे 

शिकायत नहीं तुमसे गिला खुद से रहेगा 
मेरी नजरों में ही कितना गिराया है मुझे 

नादानी है मिलने जुलने को रफाकत कहना 
कड़वा है मगर सच दुनिया का बताया है मुझे 

ए दोस्त इसे हम अपना ही पागलपन कहेंगे 
तेरी याद ने आज फिर बहुत रुलाया है मुझे !

Tuesday, October 11, 2011

ग़ज़ल




दिल कि बेखुदी को किसका ख्याल आया 
खिड़की के चाँद में    ये कौन मुस्कुराया..

बे  मांगे मुरादों को   पनाह मिल गयी 
टूटते तारे ने  जब , दुआ में सर उठाया 

कतरा कतरा टूटती बारिशों  कि तरह 
लम्हों कि आरजू ने मुझको आजमाया 

चाँदनी में रास्ता   वो जुगनू भटक गया 
और जलते चिराग ने,अँधेरा गले लगाया

मौजो कि रवानी को किनारा कौन देता 
कागज़ कि नाव को जैसे पानी में बहाया !

- वंदना


तुम्हे जिस सच का दावा है  वो झूठा सच भी आधा है  तुम ये मान क्यूँ नहीं लेती  जो अनगढ़ी सी तहरीरें हैं  कोरे मन पर महज़ लकीर...