गीत, ग़ज़ल, नज्म ..ये सब मेरी साँसों कि डोर, महंगा पड़ेगा बज्म को मेरी खामोशियों का शोर ! --- "वन्दना"
Friday, October 21, 2011
Wednesday, October 19, 2011
Monday, October 17, 2011
Sunday, October 16, 2011
Saturday, October 15, 2011
Wednesday, October 12, 2011
कड़वा है मगर सच दुनिया का बताया है मुझे !
जिंदगी का अहम् सबक सिखाया है मुझे
ख़्वाब ओ हकीकत में फर्क दिखाया है मुझे
कल रोते हुए तुमने ही लगाया था गले
भरी महफ़िल में आज गैर जताया है मुझे
अपनी सफाई में मेरे पास कुछ है ही नहीं
मेरी ही नजर में गुनहगार बनाया है मुझे
दोस्ती के जैसे अब मतलब ही खो गये
रिश्तों का ये कैसा सच पढ़ाया है मुझे
शिकायत नहीं तुमसे गिला खुद से रहेगा
मेरी नजरों में ही कितना गिराया है मुझे
नादानी है मिलने जुलने को रफाकत कहना
कड़वा है मगर सच दुनिया का बताया है मुझे
ए दोस्त इसे हम अपना ही पागलपन कहेंगे
तेरी याद ने आज फिर बहुत रुलाया है मुझे !
Tuesday, October 11, 2011
ग़ज़ल
दिल कि बेखुदी को किसका ख्याल आया
खिड़की के चाँद में ये कौन मुस्कुराया..
बे मांगे मुरादों को पनाह मिल गयी
टूटते तारे ने जब , दुआ में सर उठाया
कतरा कतरा टूटती बारिशों कि तरह
लम्हों कि आरजू ने मुझको आजमाया
चाँदनी में रास्ता वो जुगनू भटक गया
और जलते चिराग ने,अँधेरा गले लगाया
मौजो कि रवानी को किनारा कौन देता
कागज़ कि नाव को जैसे पानी में बहाया !
- वंदना
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सोचती हूँ इस फ़साने का अब कोई अदम लिख दूं क़त्ल ए किरदार से पहले एक आखरी नज्म लिख दूं .... जिंदगी नयी शर्तों पर फिर जीने के मोहलत ले आय...





