गीत, ग़ज़ल, नज्म ..ये सब मेरी साँसों कि डोर, महंगा पड़ेगा बज्म को मेरी खामोशियों का शोर ! --- "वन्दना"
Subscribe to:
Post Comments (Atom)
तुम्हे जिस सच का दावा है वो झूठा सच भी आधा है तुम ये मान क्यूँ नहीं लेती जो अनगढ़ी सी तहरीरें हैं कोरे मन पर महज़ लकीर...
-
कुछ रिश्ते बेनाम होते हैं कुछ रिश्तों के नाम होते हैं बेनाम रिश्ते में कोई शर्त नहीं होती सिर्फ प्रेम होता है वो क्यूं हैं .क्या ...
-
वफायें ..जफ़ाएं तय होती है इश्क में सजाएं तय होती हैं पाना खोना हैं जीवन के पहलू खुदा की रजाएं.. तय होती हैं ये माना... के गुन...
-
सोचती हूँ इस फ़साने का अब कोई अदम लिख दूं क़त्ल ए किरदार से पहले एक आखरी नज्म लिख दूं .... जिंदगी नयी शर्तों पर फिर जीने के मोहलत ले आय...

वाह: बहुत खूब कहा...ल़फ्जों के रिश्ते भी अजी़ब होते हैं..सुन्दर अभिव्यक्ति...वंदना जी..
ReplyDeleteबहुत सुन्दर प्रस्तुति!
ReplyDelete--
इस प्रविष्टी की चर्चा कल रविवार (01-07-2012) के चर्चा मंच पर भी होगी!
सूचनार्थ!
बहुत सुन्दर......
ReplyDeleteबढ़िया भाव |
ReplyDeleteआभार ||
☺ वाह
ReplyDeleteक्या कहने
ReplyDeleteबहुत सुंदर
बहुत सुन्दर....
ReplyDelete:-)
सन्नाटों की ख़ामोशी.
ReplyDeleteबहुत खूब.
सुंदर त्रिवेणी
ReplyDeletekhubsurat triveni vandana ji
ReplyDeletetruly so!!
ReplyDelete