Monday, February 17, 2014

दिल एक पटरी का मुसाफिर है




रह गया बहुत कुछ पीछे 
कुछ बहुत आगे निकल गया 

मगर वो बहुत कुछ 
जो मुझमे ठहरा हुआ है 

गुजरते कारंवा में 
एक परछाई सा 

वो मेरे हिस्से का मौन 
और तेरे हिस्से का शोर है 

जिसके भरे होने में भी 
खाली है जिंदगी 
किसी प्याले कि तरह 

वक्त कि टूटन से 
झांकते  लम्हे हैं 
जिन्हे  शिकायत है 
उनके हिस्से में 
 दोराहा न होने कि 


जहन में पलकर 
बूढा होता 
यादों का बरगद 
इसे कौन समझाए 


दिल एक पटरी का मुसाफिर है 
जो नही चुनता वक्त के दोराहे !



- वंदना 














Thursday, December 12, 2013

छणिकाएं




गुम गये शायद 

वो सिक्के इबादत के 
दौडती जिंदगी ने जो 
ठहरे पानी में फेंके थे !!

*********



खुद को भूल बैठे हैं 

तुमको गवां बैठे हैं 
एक दोस्त कि कमी 
अक्सर खलेगी हमको 
आवारगी के दिन 
जब भी याद आयेंगे !!


**********


टूटे तो बहुत मगर 

घुटनो पे नही आए 
इश्क में सस्ते कोई 
सौदे नही भाए 
अपने भी हिस्से आयी है 
इतनी बेगुनाही तो 


~ वंदना







पतझड़ के पंख रंगने को !






जैसे भरता है कोई 
अपने खालीपन को 
यादों कि झिलमिल से 


जैसे   पार करना होता है 
कोई सन्नाटा
 एक अतीत के शोर के साथ 

जैसे देखा करते हैं परिंदे  
पतझर से बाजी हारते 
पेड़ों पर अपने बिखरते 
घरोंदों को 

जैसे छोड़ता जाता है पतझड़ 
पीले पत्तों पर अपने 
परों के निशाँ 

जैसे ले जाती है बरसात 
रंग तितलियों से 
आसमां में एक इंदधनुष 
रचने को 

 कुछ रंग चुराएँ थे  मैंने भी 
उन गुजरी हुईं बहारों से 
पतझड़ के पंख रंगने को ! 

~ वंदना 






Sunday, December 8, 2013

त्रिवेणी,



वक्त समझ कर कैद किया था मुट्ठी में कुछ और निकला 
हमने लफ़्ज़ों में मौन बुना था जन्म जन्म  का शोर निकला 

शायद जिंदगी बस ऐसी ही  कुछ पहेलियों का नाम हैं !      


 ~ वंदना 









Thursday, November 28, 2013

ग़ज़ल




लाख चाह कर भी पुकारा  जाता नही है 
वो  नाम अब  लबों पर     आता नही है 

इसे खुदगर्जी कहें या बेबसी का नाम दें 
चाहते हैं पर अना  से हारा जाता नही है 

दिल ख़्वाबों में भटकता एक बंजारा है 
कि जिसके हिस्से में सबात आता नही है  

छुप गया  वो चाँद अब आसमाँ के पीछे 
नूर ए अक्स मगर क्यूँ धुंधलाता नही है 

मुक्कमल दी हैं  हमने सजाएँ  दिल को 
कसूर मगर  इसका समझ आता नही है 

न तुम खफा रहो न किसी को रहने दो 
जो चला जाता है दुबारा आता नही है 

इस बात के एहसास और डर में मरते हैं 
 जिन्दा रहने का हुनर भी आता नही है  !!




~~ वंदना 



Tuesday, November 19, 2013

मुलाक़ात

       

बरसों के बाद यूं देखकर मुझे 
तुमको हैरानी तो बहुत होगी 

एक लम्हा ठहरकर तुम 
सोचने लगोगे ...

जवाब में कुछ लिखते हुए 
तुम्हारी उँगलियाँ लड़खड़ाएंगी 

बचपन कि किताब के कई धुंधले वर्क
तुम्हारे मन कि बेचैन हवा में उड़कर  
आँखों में उतर आयेंगे शायद 

तुम्हारे कई शरारती से सवाल 
तुमको हैरान करेंगे.. 

फिर एक अजीब इत्तेफाक का 
तुम इसे नाम भी दोगे..

मगर तुमको कहाँ एहसास भी होगा 
कि बचपन कि दहलीज़ से 
उम्र के इस पड़ाव तक 
मैंने इस पल को हमेशा 
अपनी उम्मीदों में जिया है  

तुमको खोजा है अक्सर 
नींदों कि भटकन में 
तुमको पाया है अक्सर 
सपनो कि सरगम में.. 

इल्तेज़ा है बस यही  
तुमसे ऐ मेरे दोस्त  
इस  मुलाक़ात को तुम 
आखिरी मुलाक़ात न करना !



~ वंदना 








Thursday, September 26, 2013

मीठा हो जाता है हर दर्द गुनगुनाने से



दिल मुझसे पूछता है ये  बात हर बहाने से
क्या जिंदगी  होगी  आसां तुझे भुलाने से  ?

मुख़्तसर सा असर हो तो दिलासा भी दूँ
मर्ज घटता नही किसी का, जहर खाने से

है मुनासिब हम इसको खुदखुशी ही कहें
गुनाह कम नही होगा  इलज़ाम लगाने से

गुजरे लम्हों कि  तस्वीर निखर जाती है
दिल के दरिया में बस  इक उछाल आने से


 सोचते  हि तुझे घटाओ में दिए जल उठे 
जाने बारिशों पे क्या गुजरती तेरे आने से 


ये तजुर्बा भी शायरी ने दिया है हमको
मीठा हो जाता है  हर दर्द गुनगुनाने से



- वंदना 








तुम्हे जिस सच का दावा है  वो झूठा सच भी आधा है  तुम ये मान क्यूँ नहीं लेती  जो अनगढ़ी सी तहरीरें हैं  कोरे मन पर महज़ लकीर...