Thursday, January 17, 2013

फांसले


फांसले 
जिन्दगी कि जड़ो में 
गहराती हुई 
एक परिभाषा 


फांसला जमीं आसमां के बीच का 
फांसला डूबते सूरज और उगते चाँद के बीच
उनकी सीमाए तय करता

लेकिन इन फासलों में
ही सांस लेता है
सबका अपना अपना वजूद
वो हैं क्योकिं फासले हैं


अच्छे लगने लगे हैं
मुझे ये फासले

फासलें राही और मंजिल के
सपने और हकीकत के
फासले शफक और उफक के
फांसले उम्मीद और भरम के

फांसले ..
एक नदी के दो किनारों के

फासले हैं ...तो किनारे हैं
किनारें हैं ..तो बहाव है
बहाव है .. तो नदी है
नदी है ...तो  तृप्ति है


और जीवन की इसी
तृप्ति को मैंने
जिया हैं इन फासलों में
जिनमे सांस लेता
एक पहला पहला  प्यार
मेरी अहसासों की जीवितता को
हमेशा धड़कने बख्सता रहेगा ...

और हम अपनी अपनी
जगह लिए हुए
 यूँ  ही रहेगें
......
 "मैं " .......... .... .....".तुम "
ये फांसलें !




- वंदना



























Monday, December 31, 2012

पुल



         लड़की को रोज सुबह एक नदी के पुल वाले रास्ते से गुजरना होता है, नदी के दुसरे छोर से उगते हुए सूरज कि तपिश से नदी में उठती  धुंध  ऐसी  मालूम होती हैं  जैसे नदी सांस ले रही हो और उसकी साँसों में महक रही हो सारी फिज़ा ....उठते हुए बादलों के बीच से गुजरना सुबह का सबसे सुंदर और अच्छा लम्हा होता है ..जिससे महकता रहता है उसका  दिन . और जब शाम को काम से आते वक्त वहीँ  से होकर लौटती है तो  देखती है उस उगते  हुए चाँद को ..चाँद कि दुनिया कभी घटती कभी बढती ...और कभी कभी अमावश कि काली रातों में उजड़ी हुई दिखाई देती है |
               
     अपने भीतर के जिस ठहराव  को बाँधने में उसने अपने  तीन साल बिता दिए ...वो हर रोज दो बार उस पुल पर बिखरता हुआ महसूस होता है. क्योकिं एक ऐसे ही खामोश पुल को उसने जिन्दगी में अपने आप से पार उतरने का जरिया बनाया हुआ है जिसका नाम है ख़ामोशी ........वो भटकने लगती है अपने आप में कहीं. ...कुछ बिखरने लगता है रेत कि तरह उन महकते हुए झोकों के साथ और किरक उठती हैं  कुछ चाही -अनचाही सी यादे.
      अनगिन अजन्मी नज्मों में उलझ जाती है  ......जकड लेती हैं उसे अपनी ही साँसे ...भर आती है रुदन  गले कि रगों तक  ..बार बार झाँकती है अपने जहन में .....उन सवालों के जवाब ढूँढने के लिए .....जो लिपटे हुए हैं  उसकी रूह से किसी सांप कि तरह ..मानो चन्दन हो रहा हो वजूद उसका.


क्या वो अपने ही बुने हुए किसी भ्रम जाल में फंस कर रह गयी है ?
 ...इतनी जद्दोजहद किस लिए ..क्या हैं  ये गिरहें .. ये कशमकश  !
सायद एक कहानी जिसके किरदार धुंधलाने लगे हैं ....मगर इस धुंध में अहसास भटक रहे हैं उसी ताजा हवा के झोके कि तरह .. दिशा हीन ...जिनका न वजूद  मालूम होता है न अस्तित्व ...........मगर फिर भी हैं   बस  उन्ही कुछ चीज़ों कि तरह जो दिखाई नहीं पड़ती मगर  हैं इस प्रकृति का हिस्सा बनकर जिनका वजूद भी और अस्तित्व भी !


- वंदना

Saturday, December 29, 2012

दामिनी


" दामिनी "

मुझे अपना कहने वालो
मेरे आदर्श देश के वासियों 
अगर तुम्हे जीना है बिना शर्मिंदगी 
लाचारी और बिना किसी खौफ के 
तो मेरे मरने को जिन्दा रक्खो 
अपने जहन में , आत्मा में , अपनी याद में 

मेरे उन सपनो के लिए नही जो 
मेरी आँखों में मेरे मरने से पहले मर गए 

मेरी उन चीखों के लिए नही जो 
अँधेरी नगरी के चोपट राजाओं तक नही पहुँच सकी 

मेरे माँ बाबा के उन अरमानों के लिए नही 
जो ना दफनाई हुई लाश कि तरह हमेशा उनके साथ रहेंगे 

मेरे उन ख्वाबों के लिए भी नही 
जो मरकर भी मुझमे जिन्दगी तलाशते रहे 

मेरे साथ तिल तिल कर मरती 
मेरे अपनों कि अंतरात्मा  के लिए भी नही 

मेरी मौत को जिन्दा रखना होगा तुम्हे
इंसानियत पर लगे कलक धोने के लिए 

हर रोज जाने कितनी रूहें  दफना दी जाती हैं 
जिन्दा लाश बनाकर ....उनकी आवाज़ बनने के लिए 

कल फिर किसी अँधेरी गली या नुक्कड़ पर 
फिर कोई चीख न गूंजने पाए उसके 
बचाव में हथियार बनाने के लिए ...


मुझे जिन्दा रक्खो खुद में 
अपने अपने अस्तित्व को बचाए रखने के लिए ! 


- वंदना 

Friday, December 7, 2012

त्रिवेणी




सुनकर चौंक से गये हैं कान 
रस हवाओ में घोल रहा है.. 

जाने किस दर्द में परिंदा बोल रहा है !

Friday, November 30, 2012

त्रिवेणी

  



कुछ सुलझाने में उलझ गया ,कुछ उलझ उलझ कर सुलझ गया 
 
मुट्ठी की रेत फिसल गयी ...आँखों का दरिया उतर गया 


जिंदगी  थी जो ठहरी रही ......वक्त था सो  गुजर गया  !!



वंदना  










Saturday, November 24, 2012

दिल कि जमीं पे अब कोई सहरा नही चाहिए !




इस रात का अब हमें  सवेरा नही चाहिए 
तू सूरज है तो उजाला तेरा नही चाहिए 

जो न हो दिल में चेहरे पे अच्छा नही लगता 
रफाकत में रंजिशों का पहरा नही चाहिए 

ये दिल वो पर कटा एक परिंदा है जिसे 
आसमानों का कोई अब फेरा नही चाहिए 

कमजोर बनाता है ये दीदार ए चाँद हमें 
नींदों में अब कोई रैन  बसेरा नही चाहिए 

जिया है हमने टूटते   हुए हर भरम को  
पलकों पे कोई ख़्वाब सुनहरा नही चाहिए 

इबादत कि है दिल से तो पहुंचेगी जरूर 
टूटकर गिरता हुआ ये तारा नही चाहिए 

वो आँखे ही  काफी थी  खुदखुशी के लिए 

इस जन्म तो दूसरा अब झेरा नही चाहिए 

चल जिन्दगी तुझे अब बागबानी सिखाते हैं 
दिल कि जमीं पे  अब कोई सहरा नही चाहिए !

वंदना 

Tuesday, November 20, 2012

ग़ज़ल




हो जाए ऐसा खुदा न खास्ता तो 
याद आये भूला हुआ रास्ता तो 

नींदों में हमें है चलने कि आदत 
अगर शिद्दत से वो पुकारता तो

खामोशियों को जुबां हमने जाना 
कयामत ही होती गर बोलता तो

होता यूँ के टूटते बस भरम ही 
गर जाते में उसको टोकता तो

उसी कि नजर का जवाब हम थे 
आईने में खुद को निहारता तो

मर के भी मैं जी उठूंगा शायद 
दिया अपना जो उसने वास्ता तो

तुम्हे जिस सच का दावा है  वो झूठा सच भी आधा है  तुम ये मान क्यूँ नहीं लेती  जो अनगढ़ी सी तहरीरें हैं  कोरे मन पर महज़ लकीर...