Thursday, July 7, 2016

ग़ज़ल




पहले पहल ही दिल दुखता है जब चीज़ कोई खो जाती है
फिर हमको खोते  रहने की,  इक आदत सी हो जाती है

पानी में फेंका न करो  अपनी किसी इबादत को
 पहले सिक्के खोते हैं, और, फिर दुआ खो जाती है

कितनी देर ठहर सकेगी पलकों पर ये  पीर पुरानी
आँखों को मलते ही दिल में ,टीस नयी उग आती है

अपनी समझ पतवार ए जिंदगी, हम गुमाँ में रहते हैं
है जाना हमको वहीं जहाँ, ये लहर  हमें ले जाती है

कौन सुने साँसों की सरगम, दिल की ताल पहचाने कौन
कदम ताल का नाम जिंदगी , सो ये चलती जाती है



~ वंदना











Tuesday, July 5, 2016


त्रिवेणी

आसमान जिसमे कई छेद हैं ,चादर जो बेहद मैली है 
एक टूटा हुआ कांच का टुकड़ा है पैर में धंसा हुआ 

जिंदगी भीगता हुआ एक लंगड़ा मुसाफिर है !!



~ वंदना 

Monday, February 22, 2016




बहुत कुछ था मेरे पास 
जो मैं कह देना चाहती थी 

मगर मौन यूं  गहरा गया  जिंदगी में 
कि बहुत सोचती हूँ कुछ बोलने से पहले 

अब सोचती हूँ तो लगता है 
एक पूरी कहानी थी 
 जो सुनानी थी तुमको 
मगर वो भी खर्च हो गयी 
सिर्फ सोचने मैं 

आज मैं फिर सोच रही हूँ 
एक आखिरी बार "मुबारक"
कहना है तुम्हे !!








Wednesday, December 16, 2015

ग़ज़ल



ना ठोकर ही नयी है, ना जख्म पुराने हैं 
हर  हाल में  जिंदगी तेरे  नाज़ उठाने हैं

सिमटने तो लगें हैं पँख हमारी अना के  
आसमां से अपने भी मगर बैर पुराने हैं 

लिखी गयी हैं जिन पर तहरीर ऐ वजूद 
किताब ए जिंदगी के वो सफ़हे बचाने हैं 

ढाला जा रहा है किसी मूक बुत में मुझे 
मगर मुझको मेरे सब किरदार चुराने हैं 

लिखना है किस्सा आँखों की नमी का 
गोया  कि इस दिल के दर्द भी छुपाने हैं 

~ वंदना 

Saturday, November 28, 2015

आम लड़की

ना मैं रुक्मणि थी 
ना मैं पार्वती 
ना मैं भरोसा चुन सकती थी 
ना ही तपस्या 

राधा हो जाने की 
सारी इच्छाओं को मारकर 
जैसे चुनती है कोई लड़की 
सीता हो जाना 
ठीक उसी तरह 
मैंने भी चुनना चाहा 

मगर मेरा अहम् 
न स्वीकार सका परीक्षाएं 
और उनसे हार जाना तो
बिलकुल भी नही !

मैंने आसान समझा था 
हर रस्म हर रिवाजों से 
बगावत कर
मीरा हो जाना 

मगर मेरे पास नही था 
वो यकीन जो 
जहर के प्यालों को 
अमरित करता 

हर विकल्प को हारकर 
मैं बची हूँ वही आम लड़की 
जिसके हिस्से में दोराहे नही होते 
वह समझोतों की बिसात पर 
अंततः खुद को सिर्फ एक औरत 
साबित कर पाने तक ही समर्पित है 

~ वंदना 




तुम्हे जिस सच का दावा है  वो झूठा सच भी आधा है  तुम ये मान क्यूँ नहीं लेती  जो अनगढ़ी सी तहरीरें हैं  कोरे मन पर महज़ लकीर...