Monday, November 23, 2015

त्रिवेनियाँ




हाँ मैंने  तुम्हे पीछे से आवाज़ दी थी 
ये जानते हुए भी की तुम नही रुकोगे 

मुझे सिर्फ तुम्हारा लौटना आसान करना था !

***

अगर  जिंदगी  फिर  कभी ऐसे दोराहे पर लाये 
जहाँ तुम्हे कोई लाख चाहकर न पुकार पाये 

तो समझना तुम अपने ही सन्नाटें में खो चुके हो !


***

जब रात चांदनी की आगोश में दम तोड़ चुकी होगी 
जब चाँद को गहराते हुए सन्नाटें फाँक चुके होगे 

तुम अपनी खिड़की पर मुझे जागता पाओगे !

***

जब हर टूटन तुम्हारे बदन से रिस चुकी हो
जब पीर का पखेरू कफ़स तोड़  कर जा चुका हो

खुद को एक बार फिर जिन्दा घोषित कर देना !

***


 दिलों के कच्चे यकीन  की छत टपक रही थी 
पलकों के शामियाने में इंतज़ार भीग रहा था 

इश्क का वजूद गल कर गारा हो गया 

***


लड़की के पास चंद सीपियाँ थी  साहिल के रेत से चुनी हुईं
लड़के को उनमे एक भी मोती नही मिला तो लौट गया 

लड़की ने अपनी चाहना सीपियों के साथ रेत  में दफना दी! 




~ वंदना 





Friday, July 3, 2015

आसमां और जमीं



नीचे जमीं है
ऊपर आसमां
लगता है जैसे
मैं इन दोनों के
बीच कहीं नही हूँ

मैं हूँ तो कहाँ हूँ
किस जगह की हूँ
किसके लिए हूँ
अगर कुछ है
इस छण, तो
सिर्फ एक डर  है
खुद को खो देने का डर
इस आसमां में जहाँ
मेरे मौन के सन्नाटों सी
एक वीरानी है
या उस जमीं में जहाँ
मेरे ज़हन की बेचैनियों के
शोर सा कोलाहल है

मैं ठहरना चाहती हूँ
इन दोनों के बीच कहीं
कोई केंद्र तो होगा
मेरे दिल के किसी
कोने सा खाली

मैं ठहर जाना चाहती हूँ
एक ऐसी जगह पर जहाँ
हवाएं भी मुझसे ला-ताल्लुक सी हो !
जहाँ मुझसे मेरे होने की
गवाही न तलब की जाए !
जहाँ मेरी नींदों को
सपनो से न तोला जाएँ!
जहाँ हसरते न लाचार हों
जहाँ जिंदगी कोई
 तिजारत न जानती हो
जहाँ सब कुछ ऐसा ही हो
जैसा दिखाई पड़े
जहाँ कोई सपना
आखों में तैरता न हो
जहाँ कोई भी आहत
दिल को बेचैन न करती हो
जहाँ कोई उम्मीद आखों में
पानी बनकर न ठहरे
जहाँ सोच के धागे
कुछ भी न बुनना जानते हों
बस मैं ठहरजाना चाहती हूँ
अपने हिस्से की जमीं में
अपने आसमान के नीचे ! 

~ वंदना 

Monday, March 2, 2015

खारा पानी


( the picture taken from Google with due respect ) 

झर झर झरता खारा पानी 
झील उतरता खारा पानी 
नयनन भरता खारा पानी 
पनघट मरता खारा पानी 

हद दरिया की खारा पानी 
ज़द दरिया की खारा पानी 
लहरों की तड़प खारा पानी 
साहिल की तलब खारा पानी 

पत्थर की प्यास खारा पानी 
मछली की सांस खारा पानी 
कांटें की फांस खारा पानी 
जीने की आस खारा पानी 

बादल की प्रीत खारा पानी 
सावन का मीत खारा पानी 
जोगन का गीत खारा पानी 
अश्कों की रीत खारा पानी 

बे मुकाम सफ़र खारा पानी 
लम्बी सी  डगर खारा पानी 
छोटी सी उमर खारा पानी 
हासिल ए सिफ़र* खारा पानी 

~ वंदना 

( सिफ़र = अंत )


Tuesday, February 17, 2015

वो बेबाक सी लड़की


अक्सर जब उलझी हुई 
मैं सोचो में तुम्हारी 
खुद से खीज उठती हूँ 

जब खामोशियाँ मुझको 
गहराई का हवाला देकर 
पैदा करती हैं मुझमें 
डूब जाने का डर 

जब गले की रुदन 
मुट्ठी में कैद 
उँगलियों में उतर आती है  

तमाम ज़हमतों के बाद 
जब सुलझ ही नही पाते 
मेरी साँसों में 
अटके हुए मिसरे

जब चाहकर भी जुबाँ 
दिल का साथ नही देती 
जब मेरी आवाज़ 
चुप्पियों के लिबाज़ पहन 
दफ़न हो जाती हैं कहीं 

तो अक्सर याद आती है मुझे 
मुझमें  वो बेबाक सी लड़की !

 ~ वंदना  

Friday, February 6, 2015

नज़्म




ख़ामोशी 
जब्त के पहलू में 
जमा होता 
बेबशी का वह 
ढेर है जिसमें 
धीरे धीरे करके 
दब जाता है 
इंसान का वजूद 

और एक रोज़ जब 
दफ़न हो जाती हैं 
रूह की चीखें 
 तो उसी ढेर पर 
उग आते  हैं बबूल 

इश्क की ज़ात का 
गुलाब से बबूल होना ही 
जिंदगी के उस 
सफर की गवाही है 
जो फूल बनने की 
हसरत में 
कांटो ने तय किया है !





~ वंदना 


  



Wednesday, January 7, 2015

ऐ आते हुए साल तुम्हारा स्वागत है !!




आओ नए साल 
तुम्हारे लिए मैंने 
बहुत काम रखें हैं 

बुना है जिसे उंगलियों पर 
मैंने अपनी यादों में 
तुम्हे वह वक्त मिटाना है 

 बहुत कुछ पड़ा है 
ज़हन की आलमारी में 
जिसे तुमको उठाना है 

मुझे आज़ादी दिला देना 
गिरहों की इस जकड़ से 
खोल देना ज़हन में पड़ी 
 तमाम गाठों को

बहुत गहरा है  
वक्त का ये ठहरा हुआ सागर 
मुझे डूब जाने का डर है 
तुम प्लीज़ पार करा देना 


खामोशियाँ मुझमें 
एक  हिम के शिवाले  सा 
आकार लेती हैं 
तुम उसको मिटा देना 
गला देना 


मेरे मारे हुए मन का 
हारी हुई अना से 
समझौता जरूरी है 
बस यही एक बात 
छोटी सी 
इस दिल को बता देना 


किया है गुज़रे वक्त ने 
मेरी रूह को बोझिल 
बस कांधो को थोड़ा तुम 
और  मजबूत बना देना 

हर बोझ मुझे अपना 
खुद ही ढोने की आदत है 

ऐ आते हुए साल तुम्हारा स्वागत है !! 






Wednesday, December 3, 2014

ज़ज्बातों के नागफनी





वक्त भरता नही है 
अहम पर  लगी  चोट 
बल्कि बो देता है उसपर  
जज्बातों के नागफनी

जिसे सींचती हैं 
 मन की तृष्णा 
अकार ले रहा होता है 
जो अंतर्मन में 
अजन्मे वियोग  की तरह 

कान दबाये सुनते रहते हैं 
हर सिम्त गूंज़ते उस शोर को 
जो चुप्पियों के तिड़कने की गूंज है 

नही बचता 
जिंदगी के  चलचित्र में 
ऐसा कुछ भी 
जैसा दिखाई दे रहा होता है!


~ वंदना  












तुम्हे जिस सच का दावा है  वो झूठा सच भी आधा है  तुम ये मान क्यूँ नहीं लेती  जो अनगढ़ी सी तहरीरें हैं  कोरे मन पर महज़ लकीर...