Thursday, May 29, 2014




दिल रोया है 
उन अजीब लम्हों को याद करके ....

जब दिल के दरवाजे पर 
तेरी दस्तक से

सोयी ख्वाहिशे 
इस तरह 
तिलमिला कर जागी थी ....

मानों किसी ने 
ठहरे पानी में 
पत्थर फेंका था ,,

कोई दुआ करे
 के उन्हें फिर नींद आ जाये


शायद अब खुदा तक 
मेरी अर्जी नहीं जाती ...

Friday, May 2, 2014





न तुम इतने नादाँ थे 
न मैं इतनी समझदार 
की भर पाते 
हम
दिलों में खिंचती 
 उन लकीरों को 
कि जिन पर 
अहम की 
दीवार को 
बुनियाद मिल गई !


Sunday, March 30, 2014

पागल



वो अल्हड़ता 
वो बेपरवाही 
वो अपने हक़ में 
जी लेने कि चाहत 

उसे आवारा करार 
दे गयी 
जो  न हो सका गंवारा 
उसके पिंजर गढ़ने वालो को 

एक लक्ष्मण रेखा को 
उसकी मांग में खींचा गया 
उसको ख़ुशी ख़ुशी कबूल हुए 
उसकी हदें तय करते दायरे 


न कबूल हो सका मगर 
खुदा को ,क्योकि 
हाथो कि लकीरों में 
दुखों के कर्ज बाकी थे  

दहाड़े मार के चीखीं 
वो अपने हिस्से के 
पत्थरो पर कांच कि 
चूड़ियाँ तोड़ते हुए 

अब उसके पास 
न चीखें बची है न शोर 
न बेड़िया हैं  ,न रेखाएं 

साँसों कि किश्तें 
भरते रहने के लिए 
उसका पागल हो जाना ही जरूरी था !


- वंदना 





Monday, February 17, 2014

दिल एक पटरी का मुसाफिर है




रह गया बहुत कुछ पीछे 
कुछ बहुत आगे निकल गया 

मगर वो बहुत कुछ 
जो मुझमे ठहरा हुआ है 

गुजरते कारंवा में 
एक परछाई सा 

वो मेरे हिस्से का मौन 
और तेरे हिस्से का शोर है 

जिसके भरे होने में भी 
खाली है जिंदगी 
किसी प्याले कि तरह 

वक्त कि टूटन से 
झांकते  लम्हे हैं 
जिन्हे  शिकायत है 
उनके हिस्से में 
 दोराहा न होने कि 


जहन में पलकर 
बूढा होता 
यादों का बरगद 
इसे कौन समझाए 


दिल एक पटरी का मुसाफिर है 
जो नही चुनता वक्त के दोराहे !



- वंदना 














Thursday, December 12, 2013

छणिकाएं




गुम गये शायद 

वो सिक्के इबादत के 
दौडती जिंदगी ने जो 
ठहरे पानी में फेंके थे !!

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खुद को भूल बैठे हैं 

तुमको गवां बैठे हैं 
एक दोस्त कि कमी 
अक्सर खलेगी हमको 
आवारगी के दिन 
जब भी याद आयेंगे !!


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टूटे तो बहुत मगर 

घुटनो पे नही आए 
इश्क में सस्ते कोई 
सौदे नही भाए 
अपने भी हिस्से आयी है 
इतनी बेगुनाही तो 


~ वंदना







पतझड़ के पंख रंगने को !






जैसे भरता है कोई 
अपने खालीपन को 
यादों कि झिलमिल से 


जैसे   पार करना होता है 
कोई सन्नाटा
 एक अतीत के शोर के साथ 

जैसे देखा करते हैं परिंदे  
पतझर से बाजी हारते 
पेड़ों पर अपने बिखरते 
घरोंदों को 

जैसे छोड़ता जाता है पतझड़ 
पीले पत्तों पर अपने 
परों के निशाँ 

जैसे ले जाती है बरसात 
रंग तितलियों से 
आसमां में एक इंदधनुष 
रचने को 

 कुछ रंग चुराएँ थे  मैंने भी 
उन गुजरी हुईं बहारों से 
पतझड़ के पंख रंगने को ! 

~ वंदना 






Sunday, December 8, 2013

त्रिवेणी,



वक्त समझ कर कैद किया था मुट्ठी में कुछ और निकला 
हमने लफ़्ज़ों में मौन बुना था जन्म जन्म  का शोर निकला 

शायद जिंदगी बस ऐसी ही  कुछ पहेलियों का नाम हैं !      


 ~ वंदना 









तुम्हे जिस सच का दावा है  वो झूठा सच भी आधा है  तुम ये मान क्यूँ नहीं लेती  जो अनगढ़ी सी तहरीरें हैं  कोरे मन पर महज़ लकीर...