Saturday, August 17, 2013

त्रिवेणी


इतनी आसानी से गहराते नही हैं 
चढ जायें तो उतारे जाते नही हैं 

कुछ रंग जिन्दगी के कैनवस पर !

- वंदना

Wednesday, July 31, 2013

अजीब सा रिश्ता है !

    मैंने अपने आप से वादा किया हुआ है कि मैं इस व्यस्तता मे ज्यादा  न लिख पाऊं मगर हर महीने एक रचना जरूर  ब्लॉग पर लिखती रहूँगी  !  आज ब्लॉग पर आकर देखा तो ध्यान आया कि जुलाई कि आखिरी तारिख है और इस महीने  के नाम मैंने कुछ लिखा ही नही. आज पहली बार कुछ यूँ ही लिखने के लिए लिखने कि कोशिश कर  रही हूँ  देखते हैं कितनी सफल होती है .....अच्छी बात है कि बहार बारिश है इसलिए मूड को बन्ने मे वक्त नही लगेगा ..दो चार बूंदे हथेली पर उतरते देख खुद पे खुद बन जायेगा  :)





बरसात मे भीगी खिडकी 
और मन के सीलेपन का  
अजीब सा रिश्ता है !

इन परिंदों के भीगे पंखो 
और  मेरी नम हथेली का 
अजीब सा रिश्ता है !

इन भीगी भीगी साखों 
और मेरी भीगी पलकों का 
अजीब सा रिश्ता है !

सर सर बहते पानी का 
और तसव्वुर कि रवानी का 
अजीब सा रिश्ता है !





इस सावन की बरसात का 
और तुमसे जुडी हर बात का 
अजीब सा रिश्ता है !



वंदना 











Wednesday, June 26, 2013

त्रिवेणी




बागों के कोलाहल से सन्नाटे पुकारते हैं 
मिलजुल सब संगी पखेरू शफक बुहारते हैं 

चले भी आओ कि अब तो सांझ होती है !

- वंदना

Thursday, June 6, 2013

त्रिवेणी




छोटे से हैं पंख और आकाश नापते हो 
सुना है आकाश में सितारे बांटते हो ...

ख़्वाब और हकीकत का फर्क जानते हो ??? 




-- वंदना

Friday, May 31, 2013

ग़ज़ल




कोई गीत नये  सुरों में जब गाया जायेगा 
साँसों के साज़ को कैसे भुलाया जायेगा 


धूप है कहीं छांव  कहीं अँधेरा भी होगा 
हमारे साथ कहाँ तक ये साया जायेगा 


तवक्को फकत  एक उदासी का सामान है 
ये बोझ दिल से कब तक उठाया जायेगा 


यूँ हम पर  कोई भी इल्जाम तो नही है 
मगर क्या आइने से पीछा छुड़ाया जायेगा 


न ताल्लुक कम हुआ है न राब्ता ,मगर 
न वो आ सकेगा न हमसे बुलाया जायेगा !



वंदना 



Monday, April 22, 2013

नज्म

  
पुकारा था
 तुम्हे एक रोज़
 अजीब बेबस से 
सन्नाटों में 

मुझ से ही उठकर 
एक गूँज 
मेरे ही अहम् से 
टकराकर 
बेहद शोर करती हुई 
मुझमे ही आकर 
छन से गिरी थी 

तब से कुछ नही है 
जिंदगी में सिर्फ 
एक शोर के सिवा 

तुम्हारी आवाज़ का स्पर्श 
मेरे खामोश अफ़साने 
बहुत कुछ सुनती
 रहती हूँ मैं 

यूँ ही कान दबाये !


- वंदना 


तुम्हे जिस सच का दावा है  वो झूठा सच भी आधा है  तुम ये मान क्यूँ नहीं लेती  जो अनगढ़ी सी तहरीरें हैं  कोरे मन पर महज़ लकीर...