Saturday, December 29, 2012

दामिनी


" दामिनी "

मुझे अपना कहने वालो
मेरे आदर्श देश के वासियों 
अगर तुम्हे जीना है बिना शर्मिंदगी 
लाचारी और बिना किसी खौफ के 
तो मेरे मरने को जिन्दा रक्खो 
अपने जहन में , आत्मा में , अपनी याद में 

मेरे उन सपनो के लिए नही जो 
मेरी आँखों में मेरे मरने से पहले मर गए 

मेरी उन चीखों के लिए नही जो 
अँधेरी नगरी के चोपट राजाओं तक नही पहुँच सकी 

मेरे माँ बाबा के उन अरमानों के लिए नही 
जो ना दफनाई हुई लाश कि तरह हमेशा उनके साथ रहेंगे 

मेरे उन ख्वाबों के लिए भी नही 
जो मरकर भी मुझमे जिन्दगी तलाशते रहे 

मेरे साथ तिल तिल कर मरती 
मेरे अपनों कि अंतरात्मा  के लिए भी नही 

मेरी मौत को जिन्दा रखना होगा तुम्हे
इंसानियत पर लगे कलक धोने के लिए 

हर रोज जाने कितनी रूहें  दफना दी जाती हैं 
जिन्दा लाश बनाकर ....उनकी आवाज़ बनने के लिए 

कल फिर किसी अँधेरी गली या नुक्कड़ पर 
फिर कोई चीख न गूंजने पाए उसके 
बचाव में हथियार बनाने के लिए ...


मुझे जिन्दा रक्खो खुद में 
अपने अपने अस्तित्व को बचाए रखने के लिए ! 


- वंदना 

Friday, December 7, 2012

त्रिवेणी




सुनकर चौंक से गये हैं कान 
रस हवाओ में घोल रहा है.. 

जाने किस दर्द में परिंदा बोल रहा है !

Friday, November 30, 2012

त्रिवेणी

  



कुछ सुलझाने में उलझ गया ,कुछ उलझ उलझ कर सुलझ गया 
 
मुट्ठी की रेत फिसल गयी ...आँखों का दरिया उतर गया 


जिंदगी  थी जो ठहरी रही ......वक्त था सो  गुजर गया  !!



वंदना  










Saturday, November 24, 2012

दिल कि जमीं पे अब कोई सहरा नही चाहिए !




इस रात का अब हमें  सवेरा नही चाहिए 
तू सूरज है तो उजाला तेरा नही चाहिए 

जो न हो दिल में चेहरे पे अच्छा नही लगता 
रफाकत में रंजिशों का पहरा नही चाहिए 

ये दिल वो पर कटा एक परिंदा है जिसे 
आसमानों का कोई अब फेरा नही चाहिए 

कमजोर बनाता है ये दीदार ए चाँद हमें 
नींदों में अब कोई रैन  बसेरा नही चाहिए 

जिया है हमने टूटते   हुए हर भरम को  
पलकों पे कोई ख़्वाब सुनहरा नही चाहिए 

इबादत कि है दिल से तो पहुंचेगी जरूर 
टूटकर गिरता हुआ ये तारा नही चाहिए 

वो आँखे ही  काफी थी  खुदखुशी के लिए 

इस जन्म तो दूसरा अब झेरा नही चाहिए 

चल जिन्दगी तुझे अब बागबानी सिखाते हैं 
दिल कि जमीं पे  अब कोई सहरा नही चाहिए !

वंदना 

Tuesday, November 20, 2012

ग़ज़ल




हो जाए ऐसा खुदा न खास्ता तो 
याद आये भूला हुआ रास्ता तो 

नींदों में हमें है चलने कि आदत 
अगर शिद्दत से वो पुकारता तो

खामोशियों को जुबां हमने जाना 
कयामत ही होती गर बोलता तो

होता यूँ के टूटते बस भरम ही 
गर जाते में उसको टोकता तो

उसी कि नजर का जवाब हम थे 
आईने में खुद को निहारता तो

मर के भी मैं जी उठूंगा शायद 
दिया अपना जो उसने वास्ता तो

Monday, November 12, 2012

ग़ज़ल




चलो  जिंदगी को आसान  कर  लेते हैं 
खुद पर आज इक एहसान कर  लेते हैं 

एहसासों  को जुबाँ फिर  मिले न मिले 
एक बार ख़ामोशी को अज़ान कर लेते हैं 

मोहब्बत के  सजदे  तो महंगे बहुत  हैं 
समझोतों  को जीने का सामान कर लेते हैं 

इस पिंजर में एक परिंदा सर पटकता है 
दिल की जमीं पे एक आसमान कर लेते हैं 


देकर रिहाई इस दिल ए गुनहगार को 
इसी सजा को अपना  ईमान कर लेते हैं 

याद नही है तहरीर ए वजूद भी अब तो 
सोचते थे इश्क को  पहचान कर लेते हैं 


- वंदना 



Sunday, November 4, 2012

त्रिवेणी




"इन बादलों के आगे आगे दौड़े ...
कभी छुपने में कोई कसर न छोड़े 

चाँद.. चलती फिरती निगाहों सा !


vandana 

तुम्हे जिस सच का दावा है  वो झूठा सच भी आधा है  तुम ये मान क्यूँ नहीं लेती  जो अनगढ़ी सी तहरीरें हैं  कोरे मन पर महज़ लकीर...