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" दामिनी "
मेरे आदर्श देश के वासियों
अगर तुम्हे जीना है बिना शर्मिंदगी
लाचारी और बिना किसी खौफ के
तो मेरे मरने को जिन्दा रक्खो
अपने जहन में , आत्मा में , अपनी याद में
मेरे उन सपनो के लिए नही जो
मेरी आँखों में मेरे मरने से पहले मर गए
मेरी उन चीखों के लिए नही जो
अँधेरी नगरी के चोपट राजाओं तक नही पहुँच सकी
मेरे माँ बाबा के उन अरमानों के लिए नही
जो ना दफनाई हुई लाश कि तरह हमेशा उनके साथ रहेंगे
मेरे उन ख्वाबों के लिए भी नही
जो मरकर भी मुझमे जिन्दगी तलाशते रहे
मेरे साथ तिल तिल कर मरती
मेरे अपनों कि अंतरात्मा के लिए भी नही
मेरी मौत को जिन्दा रखना होगा तुम्हे
इंसानियत पर लगे कलक धोने के लिए
हर रोज जाने कितनी रूहें दफना दी जाती हैं
जिन्दा लाश बनाकर ....उनकी आवाज़ बनने के लिए
कल फिर किसी अँधेरी गली या नुक्कड़ पर
फिर कोई चीख न गूंजने पाए उसके
बचाव में हथियार बनाने के लिए ...
मुझे जिन्दा रक्खो खुद में
अपने अपने अस्तित्व को बचाए रखने के लिए !
- वंदना




