Saturday, October 8, 2011

त्रिवेणी






जो शहर कुछ खोने का एहसास कराये 
उस शहर में  कभी नहीं जाना चाहिए..

एक धूल आँखों में तमाम उम्र किरकती है !




- वंदना


Friday, October 7, 2011

त्रिवेणी





दोस्तों कि आदत भी थे और जरुरत भी 
वक्त के चलते ..अब दोनों ही बदल गयी ..

 जिन्दगी ..रिश्ते और ये बदलते मौसम !!

- वंदना 


Thursday, October 6, 2011

ग़ज़ल






पलके झपकूं तो कोई ख़्वाब आये शायद
आज महताब जमीं पे उतर जाये शायद !

आँख से बह गया है काज़ल ये तमाम ,
आईना फिर से आज मुस्कुराये शायद !

सिसकियाँ खामोश अब होने लगी हैं,
दिल ए पागल अब कुछ गुनगुनाये शायद !

जाने वाले को कहो जरा पलटे तो सही,
न तड़पकर कोई आवाज़ लगाये शायद !

जीने कि तलब पल पल मर के जान ली ,
अब कद्र ए जिंदगी भी समझ आये शायद ! 

वन्दना 

Tuesday, October 4, 2011

ग़ज़ल ..






कितनी भी करो नेकी कम पड़ ही जाती है 
घना हो बोझ तो  गर्दन अकड़ ही जाती है 

कितनी ही सहूलियत से बुनो कोई भी रिश्ता 
कहीं ना कहीं आखिर गाँठ पड़ ही जाती है 

जहन कि दीवारों पर  कुछ जख्म बाकी हैं 
जमीं हिलती हैं तो दरारें भी पड़ ही जातीं हैं 

भरम से परदे उठे  तो जुस्तजू पे आ गिरे  
फुलवारी उजडती है तो तितली उड़ ही जाती है 

नदी हो या जिन्दगी,है अपने सफ़र पे कायम 
जिधर से रास्ता देखे उधर को मुड ही जाती है 

******

वंदना 

Sunday, October 2, 2011

दोहे जैसा कुछ




सांच कहे एक आईना. बात पते कि मान
मूरत देख के सीरत का करिए न अभिमान !

***

नेकी उतनी कीजिये जितनी घट समाय
मान घटे जिस और उस पंथ कभी न जाय !

***






वंदना


Thursday, September 29, 2011

त्रिवेणी









एक बात को कहीं हमने कह कर खो दिया ,

एक ज़हन में रही और फ़साना बनती गयी !


चुप्पियाँ सिखाती हैं बातों का मोल रखना !















वंदना

Tuesday, September 27, 2011

एक आवारा परिंदे कि उड़ान होता गया




एक आवारा परिंदे कि उड़ान होता गया ,
दिल को हवा लगी आसमान होता गया.. 

कितने मंजर छूट गए उस बेख्याली में,
मैं खुद से भी कैसा अनजान होता गया..

ख़्वाब न हकीकत वो कुछ भी तो न था ,
महज़ इक  भरम का गुमान होता गया.. 

सुधियों को सिखाकर एक गूंगी परिभाषा , 
इक तस्सवुर दिल का महमान होता गया.. 

वरक दर वरक*   दुआएं  बहुत सी पढीं, 
हर इबादत पे दिल ये बेईमान होता गया..

जब्त कि रगों में  इज़्तराब*  ठहर  गया , 
इश्क एक पागल कि मुस्कान होता गया.. 

रफाकत का हमने भी दामन नही छोड़ा , 
खुदगर्ज कोई मुझमे पशेमान* होता गया..

प्यासे समंदर कि सब मछलियां बींद डाली,
जाता हुआ मौसम तीर ए कमान होता गया !!



- वंदना 

वरक दर वरक = पन्ने दर पन्ने 
इज़्तराब = बेचैनी / तड़प 
पशेमान = शर्मिंदा 


तुम्हे जिस सच का दावा है  वो झूठा सच भी आधा है  तुम ये मान क्यूँ नहीं लेती  जो अनगढ़ी सी तहरीरें हैं  कोरे मन पर महज़ लकीर...