Thursday, September 8, 2011

त्रिवेणी




बेबाकियों ने जिंदगी से एक दिन यूं ही पूछ लिया 
किसी की ख़ुशी क्यूं अपनी है .किसी के गम क्यूं अपने है 

जिंदगी बोली अब ये मत पूछना इन पर हक़ अपने क्यूं नहीं !


वंदना 

Wednesday, September 7, 2011

त्रिवेणी




कुछ परिंदे दूर कहीं से  इस पेड़ पर रोज आते हैं 
हैरत कि बात है इस पेड़ पर कोई फल भी नहीं 

शायद बेनाम रिश्ते इन्ही डालियों पर बसते हैं !

- वंदना 

Sunday, September 4, 2011

मौन होते हुए रिश्ते !



खतरनाक होती हैं 
पसरती हुई खामोसी 
खतरनाक होते हैं 
बातों के सिमटते दायरे 

खतरनाक हैं शब्दों कि 
बदलती हुई परिभाषाएं 
जज्बातों की 
खोती हुई गरिमा 

खतरनाक है 
टूटते हुए भरम 
भावनाओं के उधड़ते जाल 

खतरनाक होते हैं 
मौन होते हुए रिश्ते !


Tuesday, August 30, 2011

"जिन्दगी"




एक नज्म
 रह गयी है मेरी 
तुम्हारे पास  
 गलती से ..

जिसका नाम अनजाने में 
"जिन्दगी" 
रख दिया था मैंने 

मायने मालूम नहीं थे  ना  
इसलिए छूट गयी 
शायद तुम्हारे पास !

मायने समझ आएँ हैं तो 
अक्ल भी आ गयी है 
अब नहीं दोहराउंगी 
जीवन कि उन तहरीरों को 

और अगर लिखूंगी भी 
तो किसी को सौंपने कि 
भूल तो हरगिज़ नहीं करूंगी 


क्योकि गलतियां 
दोहराने पर जिन्दगी 
पछताने का  भी मौका नहीं देती 


- वंदना 


Saturday, August 27, 2011

ग़ज़ल --हम रीत पुरानी हो जाएँ




बूँद बूँद में घुलकर हम  भी  बहता पानी हो जाएँ..
जिन्दगी को लिखते लिखते एक कहानी हो जाएँ !


अल्फाज़ दिये मैंने अपनी धड़कन कि तहरीरों को..
तुम लबो से छू लो  तो ये   ग़ज़ल सुहानी हो जाएँ !


मेरी आँखों के दर्पण में   खुद को सवाँरा कीजिये.. 
इन  शर्मीली सी आँखों का  हम भी पानी हो जाएँ !


मुझको साँसे बख्श दो   मैं धड़कन तेरी हो जाऊं..
तुम जो ये सौदा करलो जीने कि असानी  हो जाएँ !


तुम राधा कि  दीवानगी  मैं हूँ   मुरली  कि  तान..
अपनाकर  इस प्रीत को  हम रीत पुरानी हो जाएँ  !!


वंदना

त्रिवेणी







 हवाओं में घुल गया कैसे  बादल कि धड़कन का शोर 
मोर पंख से बाँधी किसने ..सावन कि साँसों कि ड़ोर

दिल जानता भी कुछ नहीं और मानता भी कुछ नहीं !
  


-- वंदना 


Friday, August 26, 2011

त्रिवेणी



खुद से बाहर खोजा  तो खोया ही खोया 
खुद में अगर  झाँका  तो पाया ही पाया  


एहसासों कि दुनिया खुद से बाहर नहीं मिलती !!

तुम्हे जिस सच का दावा है  वो झूठा सच भी आधा है  तुम ये मान क्यूँ नहीं लेती  जो अनगढ़ी सी तहरीरें हैं  कोरे मन पर महज़ लकीर...