Saturday, August 13, 2011

मैंने तुमसे ही कितना छुपाया तुमको..

मैंने ख्वाबो कि इक तस्वीर सा बनाया तुमको
कितने रगों से जिंदगी में मैंने  रचाया तुमको..

जिसे ढूंढती रहीं है एक उम्र कि नादानियां
उसी  अनजान सी सूरत सा पाया तुमको..

बहारों में खिलते हुए इन फूलों  कि तरह
अपने होंठों पे मुस्कान सा  सजाया तुमको 

सावन कि सिसकती हुईं इन रातों कि तरह
मैंने अक्सर hi आंसुओं में   बहाया तुमको..

जिंदगी से ख़्वाबों कि कोई शर्त भी  नही थी
बेसबब सा हर एक आरजू में बसाया तुमको..

रह रह के चोंकाया  बीते हुए लम्हों ने मुझे
अपनी कोशिशों में कितना भुलाया तुमको..

तुम नज्मों में बिखर गये मेरी रूह बनकर
मैंने    तुमसे ही     कितना छुपाया तुमको..


- वंदना
8/12/2011 

Thursday, August 11, 2011

ग़ज़ल



बात बात पे अब सब्र खोते नहीं है
रो चुके हैं बहुत  अब रोते नहीं है..
.
दिल   ये पागल है   तो हुआ करे
होश अपने हम अब खोते नही हैं..

बेबशी है कोई , जो  रहेगी  सदा 
जज्बात  बसमें कभी होते नहीं हैं ..

देखकर लहरें ..कह रहा है कोई
दिल को भी सलीके होते नहीं है ..

नींद आँखों की सो गयी कब से
ये ख़्वाब जाने क्यूं सोते नहीं हैं
..!


--वंदना

Monday, August 8, 2011

पतझड़ में कुछ फूल खिले रह गये


दर्द के बाकी   ये सिलसिले   रह गये ,
पतझड़ में कुछ फूल खिले   रह गये...!


कैसी शिकायत  अब कौन से  शिकवे 
दिल में होके दफ़न सब गिले रह गये !


उड़ गये कुछ  परिंदे छोड़ कर बसेरा 
झूलते डाल पर  ये घौंसले   रह गये .!


क्यूं   खो गया जाने जोम* ए रफाकत 
क्यूं  दरमियाँ  अब ये फासलें  रह गये !


टूटते  रिश्ते का हुस्नएआखिर यही था 
बात करनी थी मगर होंठ सिले रह गये !




- वंदना

जोम ए रफाकत = दोस्ती का घमंड
हुस्न ए आखिर = अंतिम सुंदरता 

Saturday, August 6, 2011

आईना




उदास देखकर मुझे मुस्कुराया कभी ,

यूँ ही बेवजह  मुझको हँसाया कभी ..

बिन बोले इसने सारे ही राज़ ले लिए मेरे 

अजीब  रम्श-सिनाश*   है  ये आईना भी ..

इसने अक्सर बेबात ही बहुत रुलाया मुझको  !





रम्श-सिनाश* = friend -who understand the hints



- वंदना 


Friday, August 5, 2011

पूछो जंगल के मोर से !


क्यूं घिर आए बादल काले 
आज ये चारों से ..
किसने दी आवाज इन्हें 
पूछो जंगल के मोर से !

प्यासे तरुण किसे पुकारे 
कोयल काली क्या गाए
क्यूं झूम उठा अम्बर सारा 
क्यूं बहकी हैं आज फिजाएं..

इन आँखों कि प्यास बंधे 
कैसे काज़ल कि ड़ोर से !

क्यूं घिर आए  बादल काले 
आज ये  चारों और से ..
किसने दी आवाज़ इन्हें 
पूछो जंगल के मोर से  !


सूने तट ये किसे पुकारे..
बहती नदियाँ क्यूं बलखाये, 
कैसी   है ये   तान हवा में 
धुन बंसी कि कौन बजाये.. 

बाँध गया ये मन वैरागी 
किसे पलकों कि कोर से !


क्यूं घिर आए बादल काले 
आज ये  चारों और से..
किसने दी आवाज़ इन्हें 
पूछो जंगल के मोर से ! 



पर्वत बैठा सोच   रहा है 
क्यूं धरती  इतना इतराए..  
मोजों कि ये अजब रवानी 
लहर लहर सागर लहराए..


कोई बचा ले साहिल को 
इन लहरों के इस शोर से ! 

क्यूं घिर आए बादल काले 
आज ये  चारों और से ,
किसने दी आवाज़ इन्हें 
पूछो जंगल के मोर से !


बूंदों से तन मन ये भीगा 
गलियों से बरसात चली 
ह्रदय के सूने पनघट पर 
होले होले सांझ ढली 

कान्हा मेरे तुझे पुकारूं
और मैं कितनी जोर से !


क्यूं घिर आए बादल काले 
आज ये  चारों और से..
किसने दी आवाज़ इन्हें 
पूछो जंगल के मोर से !!


- वंदना
8/5/2010




Tuesday, August 2, 2011

ऐ मन भला क्यूं तेरी खातिर ये जीवन उलटी चाल चले ?




(इस कविता का भाव यही है के ...जीवन किसी के लिए अपनी दिशा नही बदलता ..जो जैसा है वैसा ही है और रहेगा..हमारे मन कि अज्ञानता इसे समझे या न समझे  !) 


क्यूं पश्चिम से दिन निकले ?
और क्यूं पूरब में सांझ ढले ?
ऐ मन भला क्यूं तेरी  खातिर 
ये   जीवन  उलटी चाल चले ?
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क्यूं नींदों में सूरज घर कर जाए ?
क्यूं    विरह में   न    रात जले ,
ये  अम्बर आखिर क्यूं झुक जाए 
क्यूं  चंदा का      वनवास  टले ?

ऐ मन भला क्यूं तेरी  खातिर 
ये   जीवन   उलटी चाल चले ?
- - - - - - - - - - - - - - 
बनते पतझड़ के   वो साक्षी
जिनसे कल  के मधुमास थे 
वही तरुण     अब नही रहेंगे 
जिनसे  बहारों के उल्लास थे 

बागवां   कि पीड़ा पर क्यूं 
पुष्पों  कि मुस्कान खिले ?

ऐ मन भला क्यूं तेरी खातिर 
ये जीवन  उलटी चाल चले ?
- - - - - - - - - - - - - -
राम  अहिल्या   करते  देखे 
एक  पत्थर के   तासीर को !
रघुकुल    रीत   नहीं दे पायी 
न्याय  सिया   कि पीर को !

मन कि  कंचित  कुंठाओं में 
क्यूं समर्पण कि ये रीत पले ?

ऐ मन भला क्यूं तेरी खातिर 
ये जीवन  उलटी चाल चले ?
- - - - - - - - - - - - - - 
ये सावन भला क्यूं पढ़ा करे 
प्यासे मरुथल कि तहरीर को 
क्यूं  गंगा सा  सत्कार मिले 
यहाँ   हर नदिया   के नीर को  

टूटी हुई   किसी   वीणा से ,
क्यूं सरगम कि तान मिले ! 

ऐ मन भला क्यूं तेरी खातिर 
ये जीवन उलटी चाल चले !
- - - - - - - - - - - - - - -
क्यूं पश्चिम से दिन निकले ?
और क्यूं पूरब में सांझ ढले ?
ऐ मन भला क्यूं तेरी  खातिर 
ये  जीवन   उलटी चाल चले ?

-- वंदना 

Sunday, July 31, 2011

याद गली



               इस याद गली को मैं ...जितना छोटी और संकरी करने कि कोशिश करती जाती हूँ ........उतना ही वह लंबी और विशाल होती जाती है .......लंबी इसलिए कि लाख कोशिशों के बावजूद .....आजतक मैं इसके अंतिम छोर तक कभी नहीं पहुँच सकी हूँ  !.......क्योकि कई बार जब यादों से गुजरना एक भटकाव कि तरह लगने लगता है ...जैसे किसी को खोजते खोजते हम इतने दूर निकल आएं  हों ...जहाँ  केवल पतझड़ के मौसम के  पहाड़ नंगे तपते हुए ....मगर अपनी विशालता और ऊँचाइयों कि गुरूर  को बनाये रखने के लिए  फिर भी  मुस्कुरा रहे हों ..और उन ऊंचाइयों से खड़े होकर हम.... आत्मा और दिल के पूरे जोर को निचोड़ते हुए किसी को बार बार पुकारे .......और वो पुकार .जैसे  रसोई में बहुत ऊपर से कोई बर्तन गिरकर गूँज करता  हुआ कानो  में कम्पन्न कर देता है बिल्कुल ऐसे ही आसमां कि सतह से टकराकर बेहद गूँज करती हुई छन छन पहाड़ों पर गिरती पड़ती नीचे जेमीन कि सतह पर जाकर कहीं  गुम हो जाती है .....और अपनी पुकार कि इस गूँज से डरकर ....कानो को दबाये हम काँप उठते हों और धीरे धीरे शांत होते शोर के साथ हम भी एक सहमी हुई ख़ामोशी के साथ मौन हो जाते हों .....ठीक इसी तरह इस यादों के इस भटकाव को भी मैं एक शून्यलोक पर देखना चाहती हूँ ....लेकिन तमाम कोसिशों के बावजूद आज तक कभी मुमकिन नही हो पाया !  

       शायद इसलिए क्योकि कुछ चीज़ों को खत्म कर देने भर से उनका महत्व नही खत्म होता  .....हम जिस चीज़ से भागना चाहे और उसमे हम कामयाब हो जाएँ तो शायद जिन्दगी में कुछ बचे ही न !!

तुम्हे जिस सच का दावा है  वो झूठा सच भी आधा है  तुम ये मान क्यूँ नहीं लेती  जो अनगढ़ी सी तहरीरें हैं  कोरे मन पर महज़ लकीर...