कितने रेतीले हैं
जिंदगी तेरे रास्ते ..
और कितनी बेबाक हैं
वक्त कि हवाएँ
वो एक झोका जिसकी
कोई दिशा नही थी ..
मगर मुझे दिशा हीन कर गया
आज भी बाकी हैं
मुझमे कहीं वो धूल ..
जो किरकती है
मूँह में किसी
अनकही बात कि तरह ..
जो महसूस होती है
इन साँसों मे
वीणा के टूटते तारों
कि खनक कि तरह
जो जमी हुई है
जहन कि गीली
जमीन पर साहिल के
रेत कि तरह
जो बहुत चुभती है
इन आँखों में ..
तपती धूप मे
बंजर रेती कि तरह ..
सुना है .जिंदगी में .अच्छे और बुरे
हर मौसम को गुजर जाना होता है
बारिशों का मौसम आये
इससे पहले लौटाना चाहती थी
तुम्हारे हिस्से कि वो धूल जो
मुझ में रमी रह गयी थी
चंद घंटो के उस सफ़र में
अनचाहे से एहसासों कि
वो तमाम किरचें
जिन्हें मैं मसलते हुए
बिखेरती आयी थी
उस बहुत शोर करते हुए
शहर कि विरानगी के नाम ..
वो तुम्हारे हिस्से कि धूल थी
जिसमे मेरा कुछ भी
बाकी नहीं छोड़ा मैंने
ना आँसू , न सिसकियाँ
कुछ भी तो नहीं ..
ताकि तुम्हे न चुभ सके कुछ !!
वन्दना





