गीत, ग़ज़ल, नज्म ..ये सब मेरी साँसों कि डोर, महंगा पड़ेगा बज्म को मेरी खामोशियों का शोर ! --- "वन्दना"
Saturday, March 26, 2011
Friday, March 25, 2011
Tuesday, March 22, 2011
Thursday, March 10, 2011
परदेश
मानो परिंदे निकले हैं तिनको कि तलाश में
माँ के हाथ में मुन्तसिर निवाला छोड़ आए
जो पीढ़ियों का हमें सदा वास्ता देता रहा
उसी घर पे हाँ हम ताला छोड़ आए
चलते वक्त दादी कि तस्वीर याद रही
मगर अफ़सोस वो बासी माला छोड़ आए
उन आँखों के उजाले हमारे साथ चलते हैं
चश्मे के पीछे जिनमे हम जाला छोड़ आए
वो लाठी उन अंधेरो को रास्ता दिखाती तो होगी
जीवन का जिनमे बेशकीमती उजाला छोड़ आए
बेगाने से रिश्तो में अब यहाँ वफ़ा ढूंढ रहे हैं
हम कुछ अपनों को वहां बिलखता छोड़ आए
वन्दना
Wednesday, March 9, 2011
हाँ हमने मोहब्बत कर के देख ली !
जीने की तलब मर मर के देख ली
हाँ हमने मोहब्बत कर के देख ली
जो चाहा जिंदगी से ,मिला ही नही
हमने साँसे गिरवी धरके देख ली
एक चेहरे में छुपे हैं चेहरे कितने
एक सूरत हमने पढके के देख ली
एक सूरत हमने पढके के देख ली
लहरों को नाज़ था जिसपे बहुत
वो गहराई हमने उतर के देख ली
मुझे जिंदगी के इल्जाम डराते हैं
बेगुनाही भी 'नजर' कर के देख ली !
'वन्दना'
Thursday, March 3, 2011
नम आँखों से कोई जब उदासी मुस्कुराती हैं
नम आँखों से कोई जब उदासी मुस्कुराती हैं
जल जाते हैं ये लब ,रूह झुलस जाती है..
टूटते हैं तार इक इक साँसों कि वीणा के
कोई दूर कि हवा जब सुर छेड़ जाती है ..
गुज़रता मैं नहीं हूँ उन गलियों से मगर
बंद दरिचो से कोई ...सदा तो बुलाती है..
रक्खे थे तेरे पास जो पंख गिरवी कभी
तेरी हि परवाज़ मुझे याद वो दिलाती है
होने न दिया दर्द को रुसवा कभी मगर
तन्हाई में अक्सर ही आँख भर आती है..
गिला कोई दिल को जब भी तुझसे हुआ
चुन चुन खतायें मेरी , जिंदगी बताती है.. !!
Tuesday, March 1, 2011
यूँ ही..
कुछ ख्वाबो के
पाँव नहीं होते ..
सिर्फ 'पर' होते हैं...
ये चंद ख़्वाब
वही बे पाँव वाले मुसाफिर हैं..
जब दिल के नगर से जायेंगे
तो कोई पगचिन्ह बाकी न होंगे
बस तुम चुन लेना
वो बिखरे हुए पंख
और रख लेना
यादों कि किताब के
किसी खूबसूरत से पन्ने में
जिंदगी में जब भी कोई
ऐसा पल आये जब ,
मुस्कुराने कि या उदास
होने कि वजह ना मिले..
तब खोलना जहन के
ताबूत में बंद ये किताब
महसूस करना
इन ख्वाबो कि
उस परवाज़ को
जिसे जिंदगी कि
इन हवाओ में ही कहीं
खोया हुआ पाओगी !!
वन्दना
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सोचती हूँ इस फ़साने का अब कोई अदम लिख दूं क़त्ल ए किरदार से पहले एक आखरी नज्म लिख दूं .... जिंदगी नयी शर्तों पर फिर जीने के मोहलत ले आय...



