Friday, April 16, 2010

कुछ छोटी नज्मे ..

1

शायद आसान था पर लगा मुश्किल ,
खुद को खुद में खोना...
वक्त सिखलाता है हर लम्हा
जिन्दगी को जिन्दगी होना...
अभिलाषाए देती है हर ठोकर से
आगे चलने का मशवरा ,
ख्वाइशे आसान है मगर
मुश्किल है किसी उम्मीद को खुद में बोना.




2


एहसासों कि रुई को

ख्यालो के चरखे में कातकर ...

पलकों के आसन पे

ख़्वाब कि रिदा बिछाई थी ,

नींद के अँधेरे में जाने

कोंन आकर चला गया ...

मैं दिन भर

नजर कि सिलवटो में

उसका अक्श ढूंढती रही .








3

आज एहसासों कि छटपटाती हुई नब्ज टटोली है ,

घायल से जज्बात से हर लब्ज समेटा है...

बेजुबां चीखो को नज्म ..और

साँसों कि लरज को वो साज कह रहे है,

हमने बिखरे हुए वजूद से अपना अक्स समेटा है ...






Tuesday, April 13, 2010

लड़कियाँ होती नहीं लाचार...







ना चाँद,ना शोला, शबनम
फूलो का हार
तू एक समन्दर खारा
वो पावन गंगा की धार
लड़कियाँ होती नहीं
लाचार ,
लड़कियाँ होती नहीं
लाचार....


हर रिश्ते का कर्ज
चुकाएं ...
मर्यादाओ का बोझ उठायें...
बेटी ,बहन, प्रेमिका और माँ ...
क्या इतना ही है
ओरत का सार ?


लड़कियाँ होती नहीं लाचार
लड़कियाँ होती नहीं लाचार



ना ही ये संवाद नया ...
ना ही है ये बात नयी,
सदियों से ये चलता आया
पुरुषों ने ही बेचारी बनाया ..
वो धारिका है तुम्हारे वजूद कि
देती तुम्हे आकार ....
.
लड़कियाँ होती नहीं लाचार
लड़कियाँ होती नहीं लाचार

अपनी अपनी सबने कही,
उसका
मर्म ना जाने कोय..
कैसी शिकायत तुमसे कविवर,
तुम कोई कृष्ण नहीं ..
और ये गीता का नहीं सार

लड़कियाँ होती नहीं लाचार ..
लड़कियाँ होती नहीं लाचार

स्वार्थ हैं तुम्हारे सब झूठे दस्तूर ..
खुद को समझ बैठी मजबूर
सीता, द्रौपदी, गार्गी..
इंदिरा हो या कल्पना
और ना जाने कितने नाम
जिनके दम पर होते देखा
अपना हिंद साकार
लड़कियाँ होती नहीं
लाचार
लड़कियाँ होती नहीं
लाचार

त्याग की है प्रतिमा नारी
हर रिश्ते पे खुद को है हारी
ममता स्नेह समर्पण पूजा
.इन सबकी सूरत है नारी
अंधे
मूर्ख पति के खातिर
जाने
क्यूं बन बैठी गांधार
लड़कियाँ होती नहीं
लाचार .
लड़कियाँ होती नहीं
लाचार

पुरुष होते है कितने
लाचार
इसका है उसे एहसास
भरी सभा में कुल-
वधु का
होने दिया तिरस्कार
है ऐसे पुरुष पर धिक्कार
लड़कियाँ होती नहीं
लाचार .
.लड़कियाँ होती नहीं
लाचार

चीख रहा बदनाम गलियों का शोर ..
जाने कब ख़त्म होगा इस कलयुग दौर .
अधर्मी बन सच्चाई से तुम भाग रहे
बेटियों को कोख में मार रहे
माँ कि ममता ..पिता का प्यार
कहो क्यूं हो गया लाचार
लडकिया होती नहीं लाचार ..
लडकिया होती नहीं लाचार


तुम एंह्कारी...झुक नहीं सकते ..
खोकले वसूलो से मुड़ नहीं सकते
भूल के अपने वजूद के कीमत
वो खुद को करती तुम्हे उपहार
लड़कियाँ होती नहीं लाचार ..
लड़कियाँ होती नहीं लाचार

ना चाँद,ना शोला,ना शबनम
फूलो का हार . .
तू एक समन्दर खारा
वो पावन गंगा की धार
लड़कियाँ होती नहीं
लाचार ..
लड़कियाँ होती नहीं लाचार

4/12/2010
Vandana singh..

Sunday, April 11, 2010




शिकायत में लब कभी हमने खोले नहीं..

बेरुखी से किसी कि अपने
जज्बात कभी तोले नहीं

खल जाये कोई बात हमारी .
.इतना कड़वा हम किसी से बोले नहीं

दोस्तों के गम में हम भी रो लिए
..वो जब जब मुस्कुराए ..
हम अपनी उदासियो को छुपाये
उनकी मुस्कान के संग हो लिए ...

उन्हें क्यूं लगा ....ये सब
किसी तिजारत का हिस्सा है?

क्या हर रिश्ते में यहाँ सियासत जरूरी है?

क्या हर सच्ची बात में होनी
झूठी नजाकत जरूरी है?

Thursday, April 8, 2010


मन और आँखों के दरमियाँ
ये सोंच का गहरा सागर..
जहां एक छोर से रोज
ख्वाइशो का सूरज उगता भी है
और दुसरे छोर पर डूबता भी .

.कई आशाओं के दीप जलाकर
अर्पित करती हूँ हर नयी सुबह...
कुछ तैर जाते है कुछ डूबते भी
.
कुछ ख़्वाब उठते है मन के
साहिल से बनके सतरंगी बादल .
.बरसते हैं जिन्दगी के आँगन में ..
कुछ मायूशियो कि सांझ में
उम्मीद के डूबते सूरज कि
तपिश में जलते भी है ...

संघर्ष कि धूप से
कुछ सपने
मुस्कुराते है सूरजमुखी से ..
कुछ नन्हे ख़्वाब तपिश में
अक्सर झुलसते भी है

जिस्म एक कतरा बूँद कोई ..
रूह झाल ए समंदर लगती है
एहसासों कि कश्ती जब
मुझमे डूबती भी है
उबरती भी

रोज रिस जाते है ये अनमोल
अश्क आँखों के कलश से
एक कठोर सा हिम रोज
जमता भी है
पिघलता भी

.
चीखती है ..
खामोशिया तड़पकर
एक शोर सा
गूंजता है मुझमे

मेरा वजूद
मुझे इजाजत नहीं देता मगर
उसके तसव्वुर से हम
मिटते भी है..
सँवरते भी.


Friday, April 2, 2010

गजल


दिल में अपने र्द ए महताब रखते हैं

सच है   कि चेहरे पे नकाब रखते हैं..

खुद ही तोडा था जिसे शाख से कभी
किताब में वही सूखा गुलाब रखते हैं

सीख लिया मिलने जुलने का अदब 
मिलते है तो दूर कि आदाब रखते हैं

नादानियों  पे हमको गुरूर बहुत है
 हकीकते जिस्त से ओझल ख़्वाब रखते हैं

नजर से हमारी मदहोशी नहीं जाती
उन आँखों में जाने क्या शराब रखते हैं

हमसे मिलो कभी ...तो फासला रखना
नजरो में एहसास ए तलाब रखते हैं ..

महसूस करके तो देखो कर्ब यहाँ 'वंदु'
दिल में पीर का  जैसे सैलाब रखते हैं

कलमकारों का ये हूनर गजब का है 


खुद चिलमन में रहकर भी वो 
दिल के हर जज्बात को बेनकाब रखते हैं..

Wednesday, March 31, 2010

ek chhoti si gajal ...







वो छोड़ गया मुझको ..अजब लहरों के बवंडर में
के ना तो डूब ही पाए, ...उभरना हो गया मुश्किल..

गजब का नूर था उसकी उन शतिर निगाहों में
के नादाँ था ये दिल मेरा ..संभलना हो गया मुश्किल..

वो नजरो से कर बैठा कुछ सवालात मुश्क्किल से
ना हम कुछ कह ही पाए, ...मुकरना हो गया मुश्किल..

आईना हँसता है जाने किस जुदा अंदाज से मुझपर
क्या बताये आजकल क्यूं ..संवरना हो गया मुश्किल ..


मेरा मुजरिम है उसको   खबर देना मेरे दोस्तों 
दिया है जख्म एक ऐसा के भरना हो गया मुश्किल.. 


ये बेपत्वार सी जिन्दगी हमें मंजूर कब से थी.
मगर अपना लिया इसको तो मरना हो गया मुश्किल ...

तुम्हे जिस सच का दावा है  वो झूठा सच भी आधा है  तुम ये मान क्यूँ नहीं लेती  जो अनगढ़ी सी तहरीरें हैं  कोरे मन पर महज़ लकीर...