Saturday, March 27, 2010



गुनगुनाती है जिसे हर लम्हा ख़ामोशी मेरी ..
वो ऐसा ....बेजुबां .....साज दे गया

जिधर नजर उठाई ..फ़साने बन गए
मेरे मूक एहसासों को अल्फाज दे गया

शोर ..मचाने लगी हैं ...धड़कने मेरी ,
वो दिल का जाने इन्हें कोंन सा राज दे गया..

आईने को... भला ..ये कौन समझाये,
कौन आँखों को हया के नए अंदाज दे गया...

मुझे ...डराने लगा है हर घडी खोफ कोई ,
वो जिन्दगी को कैसे ये आगाज दे गया..

** सहम जाती है ..रूह मेरी... ये सोचकर,
वो क्यूं एक झूठा ख्याल ए परवाज दे गया..

मुझे उस राह जाना नहीं ,उसे इस डगर आना नहीं,
फिर क्यूं .....वो बेवजह .... मुझे आवाज दे गया.... .


vandana

Thursday, March 25, 2010

चंद आशार





इतनी संजीदगी से चोट खाता किनारा नहीं देखा जाता

जाने क्यूं हमसे तड़पती लहरों का नजारा नहीं देखा जाता ..

जुर्म हवाओं का नहीं ....मोसम ए पतझड़ का है
मगर झरझर होता साख ए गुल बेचारा नहीं देखा जाता

एक रोज लाये थे तुम शहद सी मिठास जिन्दगी में मेरी
मगर यूँ अब बदलता मिजाज तुम्हारा नहीं देखा जाता ...

जी तो करता है के कोई दुआ आज मैं भी मांग लूं
मगर मुझसे टूटकर गिरता वो तारा नहीं देखा जाता ..

यकीं मानो खुद को इतना मजबूर कभी नहीं पाया हमने
ये क्या हुआ है के हाल हमसे हमारा नहीं देखा जाता..

कोई बताये इस दिल को मैं किन सलाखों से कैद करूँ
रुसवा होती है सख्सियत मेरी ..मुझसे यह यूँ आवारा नहीं देखा जाता....

Thursday, March 18, 2010

सांझ



एक ठिठुरती सांझ को


सागर के तट पर तपते देखा है ..


समंदर कि रूह को ..तपिश से..


पिघलते देखा है,


मंजर आसमां का


धुंआ धुंआ सा है ...


मैंने एक चिराग कि लो में


बादलो को जलते देखा है !!

Monday, March 8, 2010

gajal



मेरी आँखे... उबलती ...नहर सी है
तेरी यादे. . कसम से ..कहर सी है

दर्दे दिल को सहलाता है तस्सवुर तुम्हारा
अजीब दवा है .....जो . .जहर सी है

इज्तराब ए इश्क क्या चीज़ है मालूम नहीं
मगर एक बेचैनी हमें आठो पहर सी है

खुद में सिमटकर रहना फिदरत है हमारी
फिर क्यूं हालत अपनी तड़पती लहर सी है

हर लम्हा. .एक उम्र सी जीता है मेरा
हर पल कि तड़प ..बेमहर सी है..

Wednesday, March 3, 2010

त्रिवेणी


बिखरती साँसे ,छटपटाती रूह,इज्तराब ए रफ़्तार में बेइख्तियार दोड़ती धड़कने ..


तेरे तसव्वुर को सुलझाने में........हम खुद से उलझ बैठे है,,


शायद आज फिर एक गिरह नज्म बनके कागज पर उगेगी.

Friday, February 26, 2010


सितारों कि इस महफ़िल में चाँद तन्हा सा क्यूं है
खामोश है लेकिन इसके होठो पर ये शिकवा सा क्यूं है

तेरे ही दम से हैं ये आसमां कि रोनके.. मैं हैरान हूँ
सबकी आँखों का नूर आज खुद से खफा सा क्यूं है

कुछ पाकर के है खोना कुछ खोकर के है पाना
कोई समझाए जरा जिन्दगी एक जुआ सा क्यूं है

उन आँखों कि वो मस्ती मदहोश कर गयीं थी
आईना पूछ बैठा इन आँखों में ये नशा सा क्यूं है

कुछ जल जल कर बुझता रहा सीने में मेरे
कोई क्या जाने के इन आँखों में ये धुंआ सा क्यूं है

वो एक सख्स जो जुदा सा है ज़माने भर में
मेरा कोई नहीं .....फिर भी खुदा सा क्यूं है..

Thursday, February 25, 2010


चाहतो का हम भी अगर अदब जान जाते
अपनी वफाओ का कुछ सबब जान जाते ..

ना रोते यूँ बेवजह.. ना बेकरार होते
दस्तूर ए मोहब्बत को गर हम जान जाते ..

निगाह रखते हम भी ..रवानी पे अपनी
रुख हवाओं का हम अगर पहचान जाते..

बेकसूरी में हमें ये सजा शायद ना मिलती
जुर्म करने कि हम अगर अदा जान जाते..

तुझसे जुस्तजू कोई हम हरगिज ना करते
तुझे ए शितमगर जो हम पहचान जाते..

तुम्हे जिस सच का दावा है  वो झूठा सच भी आधा है  तुम ये मान क्यूँ नहीं लेती  जो अनगढ़ी सी तहरीरें हैं  कोरे मन पर महज़ लकीर...