
नींद छोड़ गयी मुझे अकेला इन गूंजते चींखते सन्नाटो में..
चाँद भी मेरी तरह सितारों के जश्न का शोर सुनता रहा
काटी है कुछ इस कदर.. ये बोझिल रात ...के
ख्यालो का काफिया मैं उधेड़ती रही वो बुनता रहा ..
चांदनी बिखेरती रही अपनी तबस्सुम से ओस के मोती..
चाँद सितारों से नजर चुराकर लबो से एक एक चुनता रहा....
यादों के आलम ...एक गम कि पोटली मेरे सिराहने छोड़ गए
एक कठोर सा हिम... मेरी आँखों में ...पिघलता रहा ..
कुछ अजनबी सदायें ...ख़ामोशी से डराती रही
एक आगाज रह रह कर के दिल पे दस्तक करता रहा
एक ख़्वाब... कुछ सहमा ..कुछ घबराया सा ...
मेरी चंचल घुंघराली लटो कि तरह पलकों से आके उलझता रहा..
शाम मैं देर तक तनहाई संग बैठी ...किनारे कि नमी में
कुछ बेनाम पैगाम लिखती रही....... रेत पढता रहा
धुल गए सब अफ़साने और सबब किनारों ने बताया ...
के रात भर समंदर लहरों के संग ठिठोली करता रहा ...
बुझ गए जब गाँव के सब दिए .....गुनगुनाती हवाओ में
एक जुगनूँ ...तीरगी संग आँख मिचोली खेलता रहा
शुक्रिया किया आज नींद का मैंने. ..मगर मैं इस रात कि..
अकेली गवाह ना थी.. एक उल्लू भी साख पे बैठा सब देखता रहा
vandana
1/28/2010

