Tuesday, January 26, 2010

मोहब्बत है हमको मोहब्बत से


ye rachna meri sabse pehli rachna hai ...:) isse pehle bhi kuch likha hoga jo ab yaad nahi ..ye rachna meri dayri k pehle panne se hai ..to ab yahi pehli kavita ka sthaan liye hue hai ...:)



मोहब्बत है हमें उस चाँद से जो अँधेरी रातो से मोहब्बत करता है
मोहब्बत है हमको उस अन्धकार में डूबे गगन से जो तारो से मोहब्बत करता है
मोहब्बत है हमें उस तन्हा आलम से जो तन्हाई से मोहब्बत करता है
मोहाबत है हमें सुबह के उस पहले नज़ारे से ..जो सूरज कि पहली किरण से मोह्हबत करता है
मोहब्बत है हमें मोसम कि उस नजाकत से जो हर मचलते दिल से मोहब्बत करता है
मोहब्बत है हमको उस बादल से जो धरती से मोहब्बत करता है
मोहब्बत है हमको उस समंदर से जो तड़पती प्यासी लहरों से मोहब्बत करता है
मोहब्बत है हमें उस बहती नदिया से जो पानी कि सिसकियों से मोहब्बत करती है
मोहब्बत है हमें उन मोजो से जो तूफानों से मोहब्बत करती है
मोहब्बत है हमें उस भँवरे से फूलो से मोहब्बत करता है
मोहब्बत है हमें उस गुलाब से जो कांटो से मोहब्बत करता है
मोहब्बत है हमें उस कमल से जो कीचड से मोहब्बत करता है
मोहब्बत है हमें अपने नादाँ दिल से जो जिन्दंगी के हर पहलू से मोहब्बत करता है
मोहब्बत है हमें अपने ख्यालो से जो किसी कि यादो से मोहब्बत करता है
मोहब्बत है हमें अपने सपनो से जो अनजान चेहरे से मोहब्बत करता है
मोहब्बत है हमको अपने दीवानेपन से जो मोहब्बत से मोह्हबत करता है...

Thursday, January 21, 2010

aashaar !!

जिन्दगी कि मुश्किल राहो पर मुझे सलीके से चलना तो नहीं आया .
.बस इतना ही अदब मुझमे ..के हर ठोकर पे मैं खुद को संभालती रही हूँ

ना बुलंदियों कि चाह है ....ना गहराहियो से डर ..शर्ते जिंदगानी
बस यही है मेरी के मैं खुद को खुद में तलाशती रही हूँ

जिस खुदगर्ज दुआ के वास्ते हाथ रब के आगे यूँ तो कभी फैलाये नहीं मैंने ..
मगर ये सच है के उसे ... टूटते तारो से अक्सर मांगती रही हूँ

जिसे भीड़ में तलाश नहीं पाई कभी नजरे मेरी
मैं अक्सर खामोश तन्हाई में उसे पुकारती रही हूँ

आईना कुछ खफा खफा सा रहता है मुझसे ..लाजमी है ..
अक्सर झुठलाकर उसे मैं खुद को किसी कि आँखों में संवारती रही हूँ.

Sunday, January 17, 2010

ऐ दुनिया तेरे कितने रंग





सच होता निलाम देखूं ...या झूठ के लगते दाम देखूं
ऐ दुनिया तेरे कितने रंग मैं क्या देखूं क्या न देखू


धर्म पे लगते बाजार देखूं ,संक्रमण सा फैला भ्रस्टाचार देखूं
लहराती फसल देखूं या देश में उगती खरपतवार देखूं.
ऐ दुनिया तेरे कितने रंग मैं क्या देखूं क्या न देखूं


त्यौहारों के सजे पंडाल देखूं, हर गली में मचा हाहाकार देखूं
ललाट पे सजता सिन्दूर देखूं या खून सने हाथ लाल देखूं.
ऐ दुनिया तेरे कितने रंग मैं क्या देखूं क्या न देखूं


नन्हे हाथों में औजार देखूं, गंगन चुम्बी मीनार देखूं
देश का विकास देखूं या भविष्य की ढहती दीवार देखूं
ऐ दुनिया तेरे कितने रंग मैं क्या देखूं क्या न देखूं


बुराई के चक्रव्यू में फसां खुद को अभिमन्यु सा लाचार देखूं .
कोरव सी सेना पर इतराऊं या अंधे की सरकार देखूं
ऐ दुनिया तेरे कितने रंग मैं क्या देखूं क्या न देखूं


सच को होता निलाम देखूं ..या झूठ के लगते दाम देखू
ऐ दुनिया तेरे कितने रंग मैं क्या देखूं क्या न देखूं ......
[vandana & neeraj ]








Tuesday, December 22, 2009

कुछ आशार !

उसके हर इल्जाम को......... सराखों पर लिया हमने
यूँ तो ..मैल ए दिल सफा करना भला किसे नहीं आता

हमारी उल्फतो को कहीं वो तिजारत ना समझ बैठे
वरना नेक दिल से वफ़ा करना भला किसे नहीं आता

ऐ मोहब्बत ..................मुझे तेरे तकाजे डराते है
वरना हाल ए दिल बयां करना भला किसे नहीं आता

सच जानकर भी दिल में अपने मैंने भ्रम रहने दिया

वरना ..आईने में खुद को परखना भला किसे नहीं आता

समेट लिया खुद ही को हमने ; नहीं तो वो बिखर गए होते
किसी अपने कि गोद में फूटकर रोना भला किसे नहीं आता

पिंजरे के परिंदे को शायद निवालों का लिहाज
रहा
वरना दर ए तकदीर खुला देख उड़ना भला किसे नहीं आता

यकीनन ,कलयुग कि करतूतों से भगवान् भी डरे बैठे है
वरना यहाँ पत्थर पर राम लिखना भला किसे नहीं आता

वंदना
२१ /१२/ २००९


...

Thursday, December 3, 2009

गजल

ये धुआं है सुलगती अंगीठी का जो आंखे मेरी कडवी हो गई ...
जब अंगार धह्केंगे ...तो माँ तवा चढाएगी ....

मुल्क में उठते धुंए से आज में कितना डर गयी ....
सुलगती लाशो के ढेर पर सियासत ...जाने क्या पकाएगी

पड़ोसन दहशत के डर से सांकल लगाये बैठी है
जाने किस भेश में हैवानियत चली आएगी ....

वो शरहदों पार जो घरो में अपने बारूद बो रहा है
घर कि ओरते कब तक चिराग डर डर के जलाएँगी ...


अपनी ही किसी चिंगारी से एक दिन राख हो जायेगा
मगर इंसानियत के मूह से ये कालिख ना जाएगी...


मेरी माँ जाने किस दर्द में अकेले बैठी रो रही है

मैं कैसे जाऊं ...मुझे देखकर रो भी ना पायेगी ....

मैं लाख पूछूंगी ...वो भीगे लबो से मुस्कुरा ही देगी
मैं सबब पूछूंगी लाल आँखों का ...वो तिनका बताएगी ....

रहने दे सखी... ना पूछ हमसे एहसास ए मोहब्बत
ये दिल कि मूक बेबसी ..कभी लबो पे आ ना पाएगी ....

किसी पिंजरे के पंछी को कभी आसमां मत दिखाना
नाजुक पंखो से सलाखे तोड़ने कि जिद में..अभिलाषाएं उसे तोड़ जाएँगी ....

12-3- 2009
-वंदना

Tuesday, November 10, 2009

मुक्तक

मुझे आदत है इन अंधेरो में रहने कि ...
ऐ जिन्दगी ये ख्वाबो के भ्रमित उजाले ...
मुझे ना दिखलाया कर ...
मेरे शहर कि हवाएं बड़ी जालिम है ...
यहाँ चिरागों कि उम्र ज्यादा नहीं होती ........

2
जिन्दगी के मायने लाख समझाए मैंने ....
कितने अरमां शीशे से ....तोडे ,
कितने जज्बातों के... मूक बुत... ढहाए मैंने...
अब तो छोड़ा है इनके हाल पर इनको ,
ये न कभी बाज आएँगी.....
बड़ी बेगैरत है ये दिल की मुरांदे ...ऐ खुदा ,
जलील होकर भी तेरी चोखट पे बार बार आएँगी ........

ऐ जिन्दगी तेरे सोदें मुझे कभी ना समझ आये ....

खुद ही को रखके गिरवी यहाँ चंद खुशिया उधार आती है ,

किस पलडे में तोलू मैं तेरी इस तिजारत को ......

लम्हों कि जीत कि खातिर...

ख्वाहिशे क्यूं सदियाँ हार जाती है...

4

ऐ जिन्दगी मैंने हर लम्हे को दिल से समेटा है ...
फिर भी क्यूं हर पल में कुछ छूट जाता है ,
वो (खुदा ) वाकिफ है मेरी हर एक बिलखती
नादाँ ख्वाहिश से ..फिर भी क्यों हर बार मुझसे रूठ जाता है

5

ऐ आईने ...मेरी हसरत ए नादानिया, जूनून ,वैराग्य....
और इस पागलपन के अंदेशे न लगाया कर ....तू सोच ....
के मस्त रवानी में बहती हवाओं की
बेताबिया के राज भला किसने जाने है ?......

6

जाने किस रुख में.. हमें बहा ले गयी तन्हाई ...
ख्वाबो के वीराने में आकर जाना हमने ,
पतझर में .. गुल ऐ शाख को आख़िर ....
क्यूं महंगी पड़ जाती है पुरवाई....

Saturday, November 7, 2009

जिन्दगी के साथ चलते ...
ख्वाबो के सुनहरे जग मगाहतो में
एक खूबसूरत से मोड़ पर ...
मैंने जिन्दगी से नजर चुराई ...
कहा ..ऐ जिन्दगी तू चल मैं आई..
जिन्दगी चलती रही पीछे मुड़कर भी न लखाई (देखा) ,,
वो भ्रम के थे उजाले जाने कहाँ खो गए....
खुद को मैंने अंधेरो में घिरा पाया ...
मैं सहमी जरा घबराई ....
मैंने फिर जिन्दगी को आवाज लगाईं....
वो न ठहरी....मैंने ही रफ़्तार बढाई ...
मुझे फिर साथ पाकर वो मुझ पर हंसी ,
मैंने भी सांस ली ...वो मुस्कुराई ...
तब एक बात अक्ल में आयी ....
जिन्दगी क्या है ये समझने के लिए
शायद ये पागलपन जरूरी था ...






तुम्हे जिस सच का दावा है  वो झूठा सच भी आधा है  तुम ये मान क्यूँ नहीं लेती  जो अनगढ़ी सी तहरीरें हैं  कोरे मन पर महज़ लकीर...