Tuesday, August 5, 2014

नज़्म



जी चाहता है पुकार लूँ 
 तुमको ख़ामोशी के उसपार से
हर आजमाइश से आगे बढ़कर 
हर खलिश को रोंधते हुए
खुद से किये हुए हर एक 
समझोते  को खत्म कर 
बस एक बेपरवाही में ।

खुद में सिमटना  संजीदगी है
 या फिर एक जकड़न का नाम. 
बंधता जाता है इंसान 
अपनी ही बुनी हुई गिरहों से । 

समझ नही पा रही हूँ मैं 
खुदगर्जी और बेबसी के बीच का
 ये फर्क जो मेरे ज़हन में 
एक लकीर की तरह 
मुक्कमल हो रहा है। 

बंट गयी हूँ मैं
 अपने ही भीतर कई हिस्सों में।  
मुझे इसका अफ़सोस भी है 
और इल्म भी,  कि  

" मजबूत होता है 
मोहब्बत की आकर्ति 
और आकर्षण में 
बंधा हुआ इंसान
  और इस बंधन से टूटकर गिरा हुआ 
उतना ही खोकला और बेबस "

~ वंदना 






Wednesday, June 18, 2014

त्रिवेणी



मुमकिन है पानी पर पैरों को जमाना 

तपती रेत का एक रोज़ आईना हो जाना 

बस तुम खुद से बहुत दूर न निकल जाना !

वंदना 


Wednesday, June 11, 2014

उलझन



अपने  अंतर्मन के 
इसी सन्नाटे से  
डरती रही मैं आजकल 

 अच्छा लग रहा है 
 मगर अब 
अपने  भीतर का ये शून्य 

मैं ठहर पा रही हूँ 
 जिंदगी के मंच के 
खुरदुरे धरातल पर 


अपनी एड़ियों की पकड़ 
मजबूत लगने लगी है 


खुद को  समझाना इतना 
मुश्किल नही था शायद 

बस वक्त लग गया 
ख़्वाब और हकीकत का 
फर्क समझने में

सुलझ गयीं हैं
मन की फांस 

मगर फिर भी है
कुछ अनसुलझा सा
इस दरमियाँ

जिसे सुलझा मैं पाती नही
और उलझना मैं चाहती नही !

~ वंदना






Thursday, May 29, 2014




दिल रोया है 
उन अजीब लम्हों को याद करके ....

जब दिल के दरवाजे पर 
तेरी दस्तक से

सोयी ख्वाहिशे 
इस तरह 
तिलमिला कर जागी थी ....

मानों किसी ने 
ठहरे पानी में 
पत्थर फेंका था ,,

कोई दुआ करे
 के उन्हें फिर नींद आ जाये


शायद अब खुदा तक 
मेरी अर्जी नहीं जाती ...

Friday, May 2, 2014





न तुम इतने नादाँ थे 
न मैं इतनी समझदार 
की भर पाते 
हम
दिलों में खिंचती 
 उन लकीरों को 
कि जिन पर 
अहम की 
दीवार को 
बुनियाद मिल गई !


Sunday, March 30, 2014

पागल



वो अल्हड़ता 
वो बेपरवाही 
वो अपने हक़ में 
जी लेने कि चाहत 

उसे आवारा करार 
दे गयी 
जो  न हो सका गंवारा 
उसके पिंजर गढ़ने वालो को 

एक लक्ष्मण रेखा को 
उसकी मांग में खींचा गया 
उसको ख़ुशी ख़ुशी कबूल हुए 
उसकी हदें तय करते दायरे 


न कबूल हो सका मगर 
खुदा को ,क्योकि 
हाथो कि लकीरों में 
दुखों के कर्ज बाकी थे  

दहाड़े मार के चीखीं 
वो अपने हिस्से के 
पत्थरो पर कांच कि 
चूड़ियाँ तोड़ते हुए 

अब उसके पास 
न चीखें बची है न शोर 
न बेड़िया हैं  ,न रेखाएं 

साँसों कि किश्तें 
भरते रहने के लिए 
उसका पागल हो जाना ही जरूरी था !


- वंदना 





Monday, February 17, 2014

दिल एक पटरी का मुसाफिर है




रह गया बहुत कुछ पीछे 
कुछ बहुत आगे निकल गया 

मगर वो बहुत कुछ 
जो मुझमे ठहरा हुआ है 

गुजरते कारंवा में 
एक परछाई सा 

वो मेरे हिस्से का मौन 
और तेरे हिस्से का शोर है 

जिसके भरे होने में भी 
खाली है जिंदगी 
किसी प्याले कि तरह 

वक्त कि टूटन से 
झांकते  लम्हे हैं 
जिन्हे  शिकायत है 
उनके हिस्से में 
 दोराहा न होने कि 


जहन में पलकर 
बूढा होता 
यादों का बरगद 
इसे कौन समझाए 


दिल एक पटरी का मुसाफिर है 
जो नही चुनता वक्त के दोराहे !



- वंदना 














तुम्हे जिस सच का दावा है  वो झूठा सच भी आधा है  तुम ये मान क्यूँ नहीं लेती  जो अनगढ़ी सी तहरीरें हैं  कोरे मन पर महज़ लकीर...