Thursday, December 12, 2013

पतझड़ के पंख रंगने को !






जैसे भरता है कोई 
अपने खालीपन को 
यादों कि झिलमिल से 


जैसे   पार करना होता है 
कोई सन्नाटा
 एक अतीत के शोर के साथ 

जैसे देखा करते हैं परिंदे  
पतझर से बाजी हारते 
पेड़ों पर अपने बिखरते 
घरोंदों को 

जैसे छोड़ता जाता है पतझड़ 
पीले पत्तों पर अपने 
परों के निशाँ 

जैसे ले जाती है बरसात 
रंग तितलियों से 
आसमां में एक इंदधनुष 
रचने को 

 कुछ रंग चुराएँ थे  मैंने भी 
उन गुजरी हुईं बहारों से 
पतझड़ के पंख रंगने को ! 

~ वंदना 






Sunday, December 8, 2013

त्रिवेणी,



वक्त समझ कर कैद किया था मुट्ठी में कुछ और निकला 
हमने लफ़्ज़ों में मौन बुना था जन्म जन्म  का शोर निकला 

शायद जिंदगी बस ऐसी ही  कुछ पहेलियों का नाम हैं !      


 ~ वंदना 









Thursday, November 28, 2013

ग़ज़ल




लाख चाह कर भी पुकारा  जाता नही है 
वो  नाम अब  लबों पर     आता नही है 

इसे खुदगर्जी कहें या बेबसी का नाम दें 
चाहते हैं पर अना  से हारा जाता नही है 

दिल ख़्वाबों में भटकता एक बंजारा है 
कि जिसके हिस्से में सबात आता नही है  

छुप गया  वो चाँद अब आसमाँ के पीछे 
नूर ए अक्स मगर क्यूँ धुंधलाता नही है 

मुक्कमल दी हैं  हमने सजाएँ  दिल को 
कसूर मगर  इसका समझ आता नही है 

न तुम खफा रहो न किसी को रहने दो 
जो चला जाता है दुबारा आता नही है 

इस बात के एहसास और डर में मरते हैं 
 जिन्दा रहने का हुनर भी आता नही है  !!




~~ वंदना 



Tuesday, November 19, 2013

मुलाक़ात

       

बरसों के बाद यूं देखकर मुझे 
तुमको हैरानी तो बहुत होगी 

एक लम्हा ठहरकर तुम 
सोचने लगोगे ...

जवाब में कुछ लिखते हुए 
तुम्हारी उँगलियाँ लड़खड़ाएंगी 

बचपन कि किताब के कई धुंधले वर्क
तुम्हारे मन कि बेचैन हवा में उड़कर  
आँखों में उतर आयेंगे शायद 

तुम्हारे कई शरारती से सवाल 
तुमको हैरान करेंगे.. 

फिर एक अजीब इत्तेफाक का 
तुम इसे नाम भी दोगे..

मगर तुमको कहाँ एहसास भी होगा 
कि बचपन कि दहलीज़ से 
उम्र के इस पड़ाव तक 
मैंने इस पल को हमेशा 
अपनी उम्मीदों में जिया है  

तुमको खोजा है अक्सर 
नींदों कि भटकन में 
तुमको पाया है अक्सर 
सपनो कि सरगम में.. 

इल्तेज़ा है बस यही  
तुमसे ऐ मेरे दोस्त  
इस  मुलाक़ात को तुम 
आखिरी मुलाक़ात न करना !



~ वंदना 








Thursday, September 26, 2013

मीठा हो जाता है हर दर्द गुनगुनाने से



दिल मुझसे पूछता है ये  बात हर बहाने से
क्या जिंदगी  होगी  आसां तुझे भुलाने से  ?

मुख़्तसर सा असर हो तो दिलासा भी दूँ
मर्ज घटता नही किसी का, जहर खाने से

है मुनासिब हम इसको खुदखुशी ही कहें
गुनाह कम नही होगा  इलज़ाम लगाने से

गुजरे लम्हों कि  तस्वीर निखर जाती है
दिल के दरिया में बस  इक उछाल आने से


 सोचते  हि तुझे घटाओ में दिए जल उठे 
जाने बारिशों पे क्या गुजरती तेरे आने से 


ये तजुर्बा भी शायरी ने दिया है हमको
मीठा हो जाता है  हर दर्द गुनगुनाने से



- वंदना 








Saturday, September 21, 2013

इश्क





 खालीपन से भरी
वो जब तनहा 
दिल के किसी 
कोने में सिमटकर 
बैठती है 

तलाशती है  खुद में 
एक बाँवरे पन को 
वही जो किसी के 
होने तक साथ था 


खोजती है उस इश्क को
जो उसके बाँवरे पन ने 
आखरी सी साँसों में 
जिया था  शायद ...

ढूंढती हूँ  उसे 
जहन में लगी
वक्त कि तस्वीरों  में

मगर
इश्क रूप नही है
इश्क सूरत नही है
इश्क मूरत नही है 
इश्क काम नही है
इश्क आँखे नही हैं
इश्क  आवाज़ नही है




काश  ऐसा होता
तो मन कि तृप्ति
सरलतम  हो सकती थी
और जिंदगी बहुत आसान

जो ठहरे तो दरिया है 
उड़े तो जैसे  बादल 

बरसे तो सावन है
कभी आँख का बहता काजल 

बूँद बूँद किसी प्यास में बँटता
दिल की झील का पानी है। 

एक समंदर खुद में लेकर
बहती नदिया की रवानी है 

जिंदगी के साज़ पे नाचती 
रूह कि टीस पुरानी है  !

आखों में पलकर जवां होती 
इश्क एक  मौन कहानी है




- वंदना







Sunday, September 1, 2013

मत चींखो मत लड़ो दामिनी


मत चींखो मत लड़ो दामिनी यहाँ ओरत होना सस्ता है
अन्धो कि चोपट नगरी में इन्साफ नही हो सकता है

तुम मर गयीं, मरती रहोगी, हर गली चौराहे पर

यह देश इस मातम को  रोज़ रोज़ कर सकता है

कौन देखे धब्बे अस्मिता के कानून जहाँ का अंधा है
जुर्म से कैसे लड़ पायेगा वो तो लाचार निहत्ता है

खिश्याया सा पूरा देश ,देखो  खुद पर हँसता है
यहाँ आसाराम जैसा भी "धर्म गुरु " हो सकता है

तुमको क्या मालूम कलयुग के धृतराष्ट्रों कि लाचारी
इस जुर्म को लेकर कैसे कोई महाभारत हो सकता है

बिगुल बजाकर हम तो देखेंगे कैसे आँचल जलता है
तुम्हारे श्राप से कौन दामिनी यहाँ कैसे कैसे गलता है
- वंदना
08/31/2013 

तुम्हे जिस सच का दावा है  वो झूठा सच भी आधा है  तुम ये मान क्यूँ नहीं लेती  जो अनगढ़ी सी तहरीरें हैं  कोरे मन पर महज़ लकीर...