Saturday, February 25, 2012

त्रिवेणी



जिंदगी तेरे पहलू में हम जितना उतरते हैं 
हर कदम पे चलकर एक नई मौत मरते हैं 

हर रोज बदल जाती हैं जीवन कि परिभाषाएं... !! 

- वंदना

Wednesday, February 22, 2012

ख़ुदखुशी !!!



ये कैसी नींद थी 
कि ये कैसा ख़्वाब था 

क्या था ..कौन था 
एक साया था ..
या भरम था  ? 

एक सबा का झौका 
या कोई तूफ़ान था ?

बुझते चिरागों का 
धुंआ महसूस होता है 
क्या कोई रौशनी थी यहाँ 
या यही फैला हुआ अँधेरा था ?


रंग फीके हो गए 
या तस्वीरे धुंधला गयीं 
चेहरे खो गए या 
आईने बदल गए है ?




ये कैसा ठहराव है ?
ये कैसा सन्नाटा है ?



कोई  सफर पर निकला तो है 
मगर  कुछ भूल आया है ?


क्या कोई चुरा ले गया 
जीने का सब जरूरी सामान 
सपने , तमन्ना ,आरजू 
धडकन ,..साँसे ...
शायद जीने के बहाने भी !


 या फिर अंतर्मन के इस 
विषैले  सागर में किसी ने 
डूबकर खुदखुशी कि  है ?


- वंदना 

Sunday, February 12, 2012



जितना खुद में सिमटते गए
उतना  ही हम  घटते गए 

खुद को ना पहचान सके तो 
इन आईनों में बँटते गये 

सीमित पाठ पढ़े जीवन के  
उनको ही बस रटते गए 

वक्त कि लाठी छोड़ छाड़ कर 
 उम्र कि राह बस चलते गये  

प्रीत न साँची पढ़ पाए तो 
रीतों के वरक पलटते गए 

जितना बढ़ा आकार नदी का 
उतना , किनारे कटते गये 


- वंदना 


Monday, January 30, 2012

गजल.




साँसों में गुम गयी या नजारों में खो गयी
नज़्म कोई मेरी इन सितारों में खो गयी

दिल के अदब को लहरें देतीं है सलामियाँ
प्यास जो दरिया थी ,किनारों में खो गयी

बात वो दिल कि जिसकी कोई जुबाँ नही
खुशबू बनके उडी और बहारों में खो गयी

 दिल के अदब को लहरें देतीं है सलामियाँ
प्यास जो दरिया थी ,किनारों में खो गयी

नींदे ले उडी हैं ......ये ख़्वाबों कि तितलियाँ
जैसे चाँद कि परी    इन तारों  में खो गयी 


होता बेख्यालियों का   .अपना ही मिजाज़ है 

तरन्नुम थी ग़ज़ल कि  जो अशारों में खो गयी 


- वंदना 




Friday, January 27, 2012

साहिल पर आँखें :)





कितनी खूबसूरत शाम है 
और मैं 
साहिल कि रेत में 
तुम्हारी आँखें बना रही हूँ ..


पता है क्यूं ?
क्यूंकि .. लहरों कि चुनोतियाँ 
स्वीकारी  हैं मैंने ...


 उन्हें  डूबने के अर्थ समझाने हैं 


 कि कितनी ख़ामोशी से
डुबो सकती हैं आँखें
बिना  किसी  आवेश के


एक मौन सी चंचलता के  पीछे
हम उतरने लगते हैं
एक खामोश झील में
बेसुध ,बेफिक्र 
किसी बच्चे कि तरह 
जिसे न गहराई का 
तकाज़ा है ...न डूबने का डर !


ना ना ...इनमे उतरने के 
चलकर जाने कि जरुरत नही 
न लहरों का बवंडर कोई 
जो खींच  ले जाये ...  


बस काफी होता है 
उन पलकों कि कोर पर 
नजर का एक छण
 ठहर जाना ..

देखो.... हारती हुई 

लहरों का गवाह है
ये डूबता हुआ  सूरज 








समंदर हार गया 
आँखें जीत गयीं 


मैं डूब रही हूँ ..


अपनी बांहों का 
सहारा तो दो !!








- वंदना































Saturday, January 21, 2012

मैं गरीब कि भूख हूँ




मैं गरीब कि भूख  हूँ 
और ....ये रोटी 
एक जलता हुआ सूर्य !

सिकता रहा हूँ आजतक 
सिर्फ इसकी तपिश भर से 

गरीबी के भूगोल में 
अपने पेट कि सीमित सी 
जरूरतों कि परिधि पर 
यूँ ही घूमता रहा हूँ 
बिना थके ..बिना रुके !

और झूझता रहा हूँ 
अपने इस सूर्य से 
समर्पित है इसे ही 
मेरी यातनाएं ,वासनाएं 
सब कुछ !

जीने का उद्देश्य हो 
या चलने कि ताकत 
मेरी लिए दोनों कि 
परिभाषा सिर्फ रोटी हैं !


भूख से जीतने कि कोशिश में 
जब भी करीब पहुँच पाया हूँ इसके 
झुलस गया हूँ ,हाथ जल गए हैं 
छिल जाती है रूह ..
निचोड़ लेती हैं इसकी तपिश 
मेरे भाग्य कि रेखाओं के पसीने को ..

जाने कैसे लोग हैं वो 
जिनकी मुट्ठी में कैद रहता है 
मेरी यातनाओं यह संघर्ष !

" आश्चर्य होता है मुझे इस दुनिया 
और दुनिया के बनाने वाले पर 
और सच कहूँ तो खुद पर
इतराता भी बहुत हूँ 

जब इसी सूर्य को किसी 
कचरे के डब्बे में पड़ा देखता हूँ " 


- वंदना 


Thursday, January 19, 2012

त्रिवेणी



नया साल आया ,दिन वही पुराने लौट आए 
अभी जो गुजरे थे ..फिर वही मौसम लौट आए,

 तुम जो लौट आओ ..तो लौट आएँ वो ज़माने भी !!


वंदना




तुम्हे जिस सच का दावा है  वो झूठा सच भी आधा है  तुम ये मान क्यूँ नहीं लेती  जो अनगढ़ी सी तहरीरें हैं  कोरे मन पर महज़ लकीर...