हर एक झंकार कि कीमत को घूँघरू समझता है
ये पैर इस पायल कि अदब ओ आबरू समझता है
फकत इनकी ही बेजुबाँनी समझता नहीं कोई
ये अश्क सांसो से हवाओं कि सब गुफ्तगू समझता है
इसकी अपनी ही रवानी है अपना ही सफ़र है
ये दिल मेरा कहाँ जिंदगी कि दू ब दू* समझता है
पलकों कि सरहद के उस तरफ कि तीरगी में
महज एक जुगनू इन अंधेरो कि आरजू समझता है
जिगर कि हर खराँच को महरूमियत से भर देता है
वो जज्बातों के फटे पहरन पर हुनर ए रफू समझता है
मैं हर बार खुद को हारकर अपने अहम् से जीत जाता हूँ
कि शायद वो मेरी हर एक खामोश जुस्तजू समझता है
दू ब दू*= भागदौड
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