Sunday, March 30, 2014

पागल



वो अल्हड़ता 
वो बेपरवाही 
वो अपने हक़ में 
जी लेने कि चाहत 

उसे आवारा करार 
दे गयी 
जो  न हो सका गंवारा 
उसके पिंजर गढ़ने वालो को 

एक लक्ष्मण रेखा को 
उसकी मांग में खींचा गया 
उसको ख़ुशी ख़ुशी कबूल हुए 
उसकी हदें तय करते दायरे 


न कबूल हो सका मगर 
खुदा को ,क्योकि 
हाथो कि लकीरों में 
दुखों के कर्ज बाकी थे  

दहाड़े मार के चीखीं 
वो अपने हिस्से के 
पत्थरो पर कांच कि 
चूड़ियाँ तोड़ते हुए 

अब उसके पास 
न चीखें बची है न शोर 
न बेड़िया हैं  ,न रेखाएं 

साँसों कि किश्तें 
भरते रहने के लिए 
उसका पागल हो जाना ही जरूरी था !


- वंदना 





गीत

नयन हँसें और दर्पण रोए  देख सखी वीराने में  पागलपन अब हार गया खुद को कुछ समझाने में  -- काली घटायें  घुट घुट जाएँ  खार...