Thursday, December 12, 2013

छणिकाएं




गुम गये शायद 

वो सिक्के इबादत के 
दौडती जिंदगी ने जो 
ठहरे पानी में फेंके थे !!

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खुद को भूल बैठे हैं 

तुमको गवां बैठे हैं 
एक दोस्त कि कमी 
अक्सर खलेगी हमको 
आवारगी के दिन 
जब भी याद आयेंगे !!


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टूटे तो बहुत मगर 

घुटनो पे नही आए 
इश्क में सस्ते कोई 
सौदे नही भाए 
अपने भी हिस्से आयी है 
इतनी बेगुनाही तो 


~ वंदना







पतझड़ के पंख रंगने को !






जैसे भरता है कोई 
अपने खालीपन को 
यादों कि झिलमिल से 


जैसे   पार करना होता है 
कोई सन्नाटा
 एक अतीत के शोर के साथ 

जैसे देखा करते हैं परिंदे  
पतझर से बाजी हारते 
पेड़ों पर अपने बिखरते 
घरोंदों को 

जैसे छोड़ता जाता है पतझड़ 
पीले पत्तों पर अपने 
परों के निशाँ 

जैसे ले जाती है बरसात 
रंग तितलियों से 
आसमां में एक इंदधनुष 
रचने को 

 कुछ रंग चुराएँ थे  मैंने भी 
उन गुजरी हुईं बहारों से 
पतझड़ के पंख रंगने को ! 

~ वंदना 






Sunday, December 8, 2013

त्रिवेणी,



वक्त समझ कर कैद किया था मुट्ठी में कुछ और निकला 
हमने लफ़्ज़ों में मौन बुना था जन्म जन्म  का शोर निकला 

शायद जिंदगी बस ऐसी ही  कुछ पहेलियों का नाम हैं !      


 ~ वंदना 









गीत

नयन हँसें और दर्पण रोए  देख सखी वीराने में  पागलपन अब हार गया खुद को कुछ समझाने में  -- काली घटायें  घुट घुट जाएँ  खार...