Thursday, September 20, 2012

त्रिवेणी


मानो बादल हँसे  हैं और पुरवाई रोई है 
सावन कि फुहारों ने चांदनी भिगोई है 

जैसे बेटी कि विदाई पर शहनाई रोई है 

- वंदना






Monday, September 17, 2012

कमजोर लड़की !


वो चुप्पियों के लिबाज़ वाली..
खुद के ही दायरे में कैद ..
एक कमजोर लड़की 

अपनी ही परिभाषाओं में 
हर वक्त उलझी हुई 

जिसे नही सिखाया सायद 
बचपन ने बेबाक होना 

जिसने खर्च दिए 
दुआओं के सब सिक्के 
हर छोटी बड़ी आरजू के नाम 
मगर नही सीखा जिन्दगी से 
इबादत का सही मतलब 

एक डर न जाने
 क्यूं ...और कब से 
धीरे धीरे पलकर बड़ा 
हो गया .दीमक सा 
उसकी ज़हन कि सीली 
परतों में 

जिसने खा ली है 
उसकी आँखों से 
मस्तियों कि चमक 

जिसने खोकला कर दिया है 
उसके आत्मविश्वास को 


पलकों में कैद है उसके 
डरी ,सहमी सी लहरे 

होठो पर कुछ मूक 
जज्बात ..ढूंढते हैं 
कोई राह उसकी आवाज
 में घुलकर बोल पड़ने को 

उसने खो दिए हैं 
सलीके जीने के 
एक ऐसे डर में जिसकी 
कोई परिभाषा ही नही 

उसे देखा है किसी कि खुशियों में 
बेहद खुश होते हुए ..वो खुशी 
जिसके लिए खर्चे थे उसने 
खुशी खुशी अपनी दुआओं के
सबसे प्यारे और कीमती सिक्के 

देखा है उसकी आँखों में एक 
सुखद अहसास को आज मुस्कुराते हुए
उसकी चुप्पियों को सुकून पाते हुए 

मगर वो ठहरी एक कमजोर लड़की 
नहीं आता उसे कुछ भी जाहिर करना


वंदना 










गीत

नयन हँसें और दर्पण रोए  देख सखी वीराने में  पागलपन अब हार गया खुद को कुछ समझाने में  -- काली घटायें  घुट घुट जाएँ  खार...