Friday, July 30, 2010

त्रिवेणी






जिन्दगी के कितने पर्वत अभी और चढ़ने हैं
कितने गमगीन सागर अभी बाकी उतरने हैं,

मुझे मेरी माँ कि आँखों में सब साफ़ दिखाई देतें हैं |


*************







Thursday, July 29, 2010




हाल ऐ दिल कभी मैंने ..तमाम ..नहीं लिखा
लिखा सब कुछ ,कुछ भी तेरे नाम नहीं लिखा

आँखों कि कौर क्या बताएगी इन आईनों का सच
भीगी पलकों का कभी मैंने इंतकाम नहीं लिखा

आँखें बंद करके तेरा सजदा जब चाहे कर लेती हूँ
इस सूरत ऐ खुदाई का चर्चा कभी सरेआम नहीं लिखा

एक जुस्तजू सर झुकाए भटकती है दरबदर
दिल कि मन्नतों का कभी कोई आयाम नहीं लिखा

ऐ जिन्दगी तेरे नतीजो से हार जाये वजूद मेरा
इतना कमजोर तो खुदा ने अपना अंजाम नहीं लिखा

इस दुनिया के मेले कितने गजब से हैं
मगर रिश्तो के हूजूम बड़े अजब से हैं ..

सूरत ए खुदाई कितनी मूरतो में पुजती है यहाँ
जानें सब हैं ..के ताल्लुक उसी एक रब से हैं ..

वो लम्हों कि शरारतें अब हमें याद नहीं
मत पूछ के हमें तुझसे मोहब्बत कब से है

दिल को ना कुछ देखने कि जिद हो गयी शायद ..
एक नजर भर के तुझे देखा जब से है

सूनी सूनी सी थी मेरे मन कि नगरिया
रहने लगी बड़ी चहल पहल यहाँ तब से है ...

एहसासों कि मेहरूमियत तो क्या कहियेगा
ये दिल में रहते बड़े ही अदब से हैं

परिभाषाएं कौन देगा पलकों कि नमी को
कोंन जानेगा ये अश्क कितने बेसबब से हैं.

Wednesday, July 21, 2010

मगर मुझको मेरी खबर हो चली .




जिन्दगी भले ही मफर* हो चली
मगर मुझको मेरी खबर हो चली ..

गुनहगार हैं फिर भी झुकती नहीं
बहुत बेहया अब ये नजर हो चली ..

तेरे तस्सवुर से दिल बहल जाता था
वो दवा कब कि बे असर हो चली ..

मोल ली काँटों से दुश्मनी ही सही
जख्मो से दिललगी मगर हो चली..

किसी मोड़ पर धूप किसी पर छाँव
जिन्दगी एक सुहाना सफ़र हो चली ..


मफर = खाली

Saturday, July 17, 2010

मुख्तलिफ मेरा .

मुख्तलिफ= different




मुझमे ..मुख्तलिफ मेरा ...
मेरी ही नजरो में
मुझे गुनहगार ठहराता है हर बार ,
जैसे हर एक खता पे
मेरा ही नाम लिखा था ...

रहता है बहुत चिडचिडा
टकराता है हर पल मुझसे
एक जिद्दी बच्चे कि तरह
हर पल मनमानी करने को आतुर..
बेवजह रोना ..बिलखना
छटपटाना . बिखर जाना
जरा सी व्याकुलता से
जैसे जहन नहीं
कोई रेत का टीला है ..

डर लगता है इस एहसासों कि पुरवाई से
एक रोज मिटटी में ही ना मिले दे इसे

जाने कितनी बार डांट झपट कर रोता
बिलखता छोड़ करवट ले सो जाती हूँ
सुबह आँखों के सूजी कौर पर
उदास बैठे देख फिर पिघलकर
पत्थर से मोम हो जाती हूँ ..

भर लेती हूँ सीने में दुलार कर
मासूम बच्चे कि तरह
एक फकत तेरे ही वास्ते ऐ दिल कब तक
मैं अपने अहम् से समझोते करती रहूंगी?

मुझसे ये मन्नते इसकी
मेरे जहन कि दीवारों से
टकराती हुई गूंजती है मुझमे
"एक पल के लिए मिलो
मुझको मेरी तरह
तुम्हारी कसम बहुत अकेले हैं.."

Thursday, July 15, 2010


इस चाँद से ये कह दो ज्यादा ना मुस्कुराये
ओकात में रहे ........दिल मेरा ना जलाये ..

मालूम है हकीकते बज्म ऐ आसमां कि ..
भीड़ में अकेला ,कब कोई तारा टूट जाये ..

पल पल पिघलती है रात अंधेर कि लो में ..
जुगनूं है कश्मकश में ..कैसे रौशनी बचाए

आसमां कि चादर पर बिखरा जो पड़ा है
ये मोतियों का खजाना उफक लाद ले जाए..

हर रोज एक कटारी चलती हैं चाँद पर
नम आँखों से चांदनी भला कैसे मुस्कुराये..



Monday, July 12, 2010



जाने क्यूं ,मूँह फुलाए बैठा है अन्धेरा
जुगनूं रात कि आँखों का तारा हुए

खफा है चाँद भला चांदनी से किसलिए
गर सितारे सभी ओझल नजारा हुए

काली अंधियारी रात में आ बरसे
सब के सब बादल आज आवारा हुए

ये कौन किसको तलाशता है आसमां में
बिजली को क्यूं ये आलम ना गँवारा हुए

नींद छोड़ कर अकेला मुझे गयी कहाँ
आँखों के स्वप्न सारे आज बेसहारा हुए

जिन्दगी ने फैलाए हाथ आज दुआ के वास्ते
दिल के अरमां टूटता जैसे कोई तारा हुए..

Sunday, July 4, 2010

मोहब्बत



चाहत जिन्दगी कि और हर पल का मरना
छटपटाती सी आरजू ..मगर मन्नत नहीं करना

बिन बात के रोना और सिसकना चुपके चुपके
यूँ जार जार होकर पल पल का बिखरना

तमाम दर्द मुट्ठी में लेकर यूँ जोरो से लेना भींच
जैसे किसी तडफते परिंदे को हाथो से क़त्ल करना

हर लम्हा तय होती मुकम्मल सजाएँ
बेजुबां चीखों को खुद में दफ़न करना

हर पल कि बेख्याली में बुनना रोज ख़्वाब नया
जैसे माटी के खिलोनो में रोज नया रंग भरना

मोहब्बत सिखा देती है मासूम दिल को
ये सब गुनाह .... बहुत संजीदगी से करना..

vandana singh
7-6 -2010

गीत

नयन हँसें और दर्पण रोए  देख सखी वीराने में  पागलपन अब हार गया खुद को कुछ समझाने में  -- काली घटायें  घुट घुट जाएँ  खार...