Wednesday, July 1, 2009

बूंदों की एक शाम


"बोली बोली रे कोयलिया ..कूक रहे मौर
मचल मचल कर चली हवाएं.. छायीं घटा घनघोर
जी चाहे नाचूं दिल खोल के सब बंधन दूँ मैं तोड़
अब टूटे चाहे पैजनिया...चाहे करे घूँघरू शोर "




बूंदों की एक शाम





जैसे
शबनम से भीगा शमां..
पैमाने की अदाओं में ढल रहा था ,

कभी मचलते हुए कभी थिरकते हुए ..
मेरे आँगन में आज सावन बरस रहा था ,

मानो खुदा की इबादत के रूप में ..
सच्चे मोतियों का हार टूटकर मेरी खिड़की पर बिखर रहा था

जिसकी तपिश मेरी रूह को शेक रही थी...
कुछ ऐसा मेरी साँसों में जल रहा था ,

नाच उठे हवा के झोकें बूंदों की ताल पर ..
दिल मेरा भी पायल के घूँघरू की तरह छनक रहा था

कभी मचलते हुए कभी थिरकते हुए ..
मेरे आँगन में आज सावन बरस रहा था ,"

गीत

नयन हँसें और दर्पण रोए  देख सखी वीराने में  पागलपन अब हार गया खुद को कुछ समझाने में  -- काली घटायें  घुट घुट जाएँ  खार...